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केनरा बैंक के मैनेजर समेत तीन को सीबीआई कोर्ट ने सुनाई 5 साल कैद की सजा, लिमिट से ज्यादा दिया था लोन

Thu, 25 Jul 2019 08:49 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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- फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
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लिमिट से ज्यादा लोन देने के 10 साल पुराने मामले में विशेष सीबीआई न्यायाधीश सुजाता सिंह ने केनरा बैंक के तत्कालीन मैनेजर, कारोबारी और आर्किटेक्ट को भ्रष्टाचार, साजिश और धोखाधड़ी समेत अन्य धाराओं में दोषी करार दिया। अदालत ने मैनेजर और दोषी कारोबारी को पांच-पांच साल की सजा सुनाई है। इसके अलावा मैनेजर पर 31 हजार तथा कारोबारी पर 60 लाख 16 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया। वहीं, आर्किटेक्ट को चार साल की सजा तथा पांच हजार के जुर्माने की सजा सुनाई। मामला कारोबारी द्वारा बैंक मैनेजर और आर्किटेक्ट के जरिये अधिक लोन लेने का है। 

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सीबीआई अधिवक्ता सतीश कुमार ने बताया कि 23 फरवरी 2012 को कैनरा बैंक के तत्कालीन डीजीएम केके दास ने इस मामले की शिकायत की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि डालनवाला स्थित एक स्कूल में खुली केनरा बैंक की शाखा के मैनेजर आरके भास्कर निवासी 6 म्यूनिस्पल रोड डालनवाला, आर्किटेक्ट डीके जैन निवासी ओमकार रोड चुक्खुवाला के जरिये कारोबारी विरेंद्र सिंह निवासी लंढौर बाजार मसूरी ने तय सीमा से ज्यादा लोन हासिल किया था। इस पर तीनों आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। मामले में अभियोजन पक्ष ने 19 गवाह और बचाव पक्ष ने चार गवाह पेश किए। जिसके बाद न्यायाधीश ने तीनों आरोपियों को सजा सुनाई। 

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ये है पूरा मामला

सीबाईआई अधिवक्ता सतीश कुमार ने बताया कि बैंक मैनेजर आरके भास्कर ने 5 जून 2009 को कारोबारी विरेंद्र सिंह के नाम बगैर किसी वैध दस्तावेज के क्रेडिट लिमिट से ज्यादा 30 लाख का लोन पास कर दिया था। जबकि क्रेडिट लिमिट और ओवर ड्राफ्ट दोनों को मिलाने के बाद उसकी लिमिट 22 लाख ही बन रही थी। विरेंद्र सिंह ने 18 जून को अपनी क्रेडिट लिमिट 30 से बढ़ाकर 50 लाख करने को कहा। साथ ही 50 हजार अतिरिक्त टर्म लोन भी मांगा। जिस पर बैंक मैनेजर ने जांच किए बगैर एडीएम को पत्र लिखकर लोन के लिए सही जांच की बात कहते हुए उसे पास कर दिया। 22 जून को मैनेजर को पत्र लिखकर आपत्ति जताई। इसके बाद भी 43 लाख की सीसी लिमिट और 50 लाख का टर्म लोन किया गया। विरेंद्र सिंह को कुल एक करोड़ 60 लाख का लोन दिया गया।

वहीं, मसूरी रोड स्थित क्यारकुली में एक और प्रॉपर्टी का हवाला देते हुए लोन मांगा गया। आर्किटेक्ट डीके जैन ने इसकी वेल्यू एक करोड़ से अधिक बताई। सीबीआई ने संपत्ति को मुख्य सड़क के बजाय अंदर पाया, जिसे तीन लाख में खरीदा गया था। वहीं, पहले लिए गए लोन के बदले जिस संपत्ति को दर्शाया गया था, उसे पहले ही बेचा जा चुका था। इसके बाद सीबीआई ने मैनेजर के घर छापा माकर कई सबूत एकत्र किए। 26 जून 2012 को सीबीआई ने कोर्ट में 16 पन्नों की चार्ज सीट धारा 120 बी, 420, 468, 471 आईपीसी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दाखिल की थी।
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