सीबाईआई अधिवक्ता सतीश कुमार ने बताया कि बैंक मैनेजर आरके भास्कर ने 5 जून 2009 को कारोबारी विरेंद्र सिंह के नाम बगैर किसी वैध दस्तावेज के क्रेडिट लिमिट से ज्यादा 30 लाख का लोन पास कर दिया था। जबकि क्रेडिट लिमिट और ओवर ड्राफ्ट दोनों को मिलाने के बाद उसकी लिमिट 22 लाख ही बन रही थी। विरेंद्र सिंह ने 18 जून को अपनी क्रेडिट लिमिट 30 से बढ़ाकर 50 लाख करने को कहा। साथ ही 50 हजार अतिरिक्त टर्म लोन भी मांगा। जिस पर बैंक मैनेजर ने जांच किए बगैर एडीएम को पत्र लिखकर लोन के लिए सही जांच की बात कहते हुए उसे पास कर दिया। 22 जून को मैनेजर को पत्र लिखकर आपत्ति जताई। इसके बाद भी 43 लाख की सीसी लिमिट और 50 लाख का टर्म लोन किया गया। विरेंद्र सिंह को कुल एक करोड़ 60 लाख का लोन दिया गया।
वहीं, मसूरी रोड स्थित क्यारकुली में एक और प्रॉपर्टी का हवाला देते हुए लोन मांगा गया। आर्किटेक्ट डीके जैन ने इसकी वेल्यू एक करोड़ से अधिक बताई। सीबीआई ने संपत्ति को मुख्य सड़क के बजाय अंदर पाया, जिसे तीन लाख में खरीदा गया था। वहीं, पहले लिए गए लोन के बदले जिस संपत्ति को दर्शाया गया था, उसे पहले ही बेचा जा चुका था। इसके बाद सीबीआई ने मैनेजर के घर छापा माकर कई सबूत एकत्र किए। 26 जून 2012 को सीबीआई ने कोर्ट में 16 पन्नों की चार्ज सीट धारा 120 बी, 420, 468, 471 आईपीसी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दाखिल की थी।