डीएवी कॉलेज प्रबंधन ने एक पत्र भेजकर शिक्षकों की कमी का ठीकरा उत्तराखंड सरकार के सिर फोड़ तो दिया है, लेकिन मामले की तह तक जाने पर पता चलता है कि इसके लिए कॉलेज प्रबंधन ज्यादा जिम्मेदार है।
पहले आरक्षित वर्ग का ख्याल न रखते हुए भर्तियां की गईं। इसके बाद सरकार ने रोस्टर प्रणाली के तहत एससी, एसटी व ओबीसी के अभ्यर्थियों को भर्ती करने को कहा तो प्रबंधन पीछे हट गया। प्रबंधन अगर चाहे तो कॉलेज में खाली पड़े 54 शिक्षकों के पदों को अपने स्तर पर ही भर सकता है।
डीएवी कॉलेज प्रबंधन सचिव मानवेंद्र स्वरूप ने छात्रों के आंदोलन के बीच एक पत्र भेजा है। पत्र में उन्होंने बताया कि कॉलेज में शिक्षकों की भारी कमी है। अगर ऐसे में सीट बढ़वाने के लिए विश्वविद्यालय से निरीक्षण कराया तो सीटों की संख्या बढ़ने के बजाय घट सकती है। शिक्षकों की कमी के लिए सरकार को जिम्मेदार बताया गया है। लेकिन, सच्चाई यह है कि पूर्व में कॉलेज में आरक्षण नियमों का पालन किए बगैर शिक्षकों की भर्ती की गई थी।
वर्ष 2009 में कॉलेज प्रबंधन ने खाली पड़ी सीटों पर भर्ती की विज्ञप्ति प्रकाशित की, लेकिन सरकार ने यह कहकर रोक लगा दी कि पहले एससी, एसटी व ओबीसी की रोस्टर प्रणाली के तहत भर्ती की जाए। इसके बाद 2011 में विज्ञप्ति निकाली तो सरकार ने फिर इसी वजह से रोक लगा दी। 2012 में भी रोक लगाई गई।
कॉलेज में कुल 187 शिक्षकों के पद सृजित हैं। इनमें से 133 पद भरे हुए हैं और 54 पद खाली पड़े हैं। इन पदों पर भर्ती का अधिकार प्रबंधन के हाथ में है। रोस्टर नियमों के हिसाब से इन पदों पर केवल एससी, एसटी और ओबीसी के युवा ही आवेदन कर सकते हैं, जो प्रबंधन नहीं चाहता है। इस वजह से यह सीटें खाली पड़ी हुई हैं।
जब तक प्रबंधन इन पदों को नहीं भरेगा, तब तक सरकार न तो नए पद सृजित करेगी और न ही भर्ती का अधिकार देगी। मामले में प्रबंधन का पक्ष लेने के लिए कॉलेज प्रबंधन सचिव मानवेंद्र स्वरूप को फोन मिलाया गया तो उनका फोन स्विच ऑफ था। उन्हें मैसेज भी भेजा गया, लेकिन उसका भी जवाब नहीं मिल पाया। इस संबंध में जब भी उनका पक्ष आएगा उसे प्रकाशित किया जाएगा।