राज्य वित्त का एक अन्य कमजोर पक्ष यह भी उजागर हुआ कि 29 मामलों में 227.70 करोड़ रुपये की धनराशि आकस्मिकता निधि के तहत मंजूर तो करा ली गई लेकिन इनकी प्रतिपूर्ति कराना मुनासिब नहीं समझा गया। आडिट में यह तथ्य भी उजागर हुआ कि 2005-06 से लेकर 2015-16 के दौरान 15323.443 करोड़ की राशि का इस्तेमाल तो कर लिया गया लेकिन अभी तक राज्य विधानसभा से इसे नियमित कराया गया है। रिपोर्ट में यह कहा गया कि सरकार के 30 नियंत्रक अफसरों ने अपने खर्चों का कैग से मिलान नहीं किया।
कहां खर्च डाले 327.25 करोड़, नहीं दिया हिसाब
प्रदेश के विभिन्न विभागों ने विभिन्न योजनाओं के 327.25 करोड़ रुपये खर्च डाले लेकिन अब तक इसका हिसाब नहीं दिया जा सका है। कैग रिपोर्ट से यह तथ्य उजागर हुआ है। वित्तीय वर्ष 2016-17 की रिपोर्ट के मुताबिक विभागीय अधिकारियों ने मार्च 2017 में 224 उपयोगिता प्रमाण पत्र महालेखाकार (लेखा एवं हकदारी) को नहीं भेजे।
कायदे से उपयोगिता प्रमाण पत्रों को सत्यापन के बाद 12 माह के भीतर भेजा जाना चाहिए था। मार्च 2017 तक 490.04 करोड़ की धनराशि के 353 उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित थे। इनमें 303.25 करोड़ धनराशि के 211 उपयोगिता प्रमाण पत्र दो साल से लटके थे। दो वर्षों से ऊपर के 186.79 करोड़ धनराशि के 142 उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित थे। कैग ने विभागों, निकायों व प्राधिकरणों के इस कार्यप्रणाली में सुधार लाने की आवश्यकता जताई है।