पारदर्शी और नियमों में बंधी निर्वाचन व्यवस्था पर भी उत्तराखंड में सवाल उठ रहे हैं। हाल यह है कि वर्ष 2009 के लोक सभा चुनाव में नैनीताल, अल्मोड़ा और चमोली जनपदों में बल्ब तक दस रुपए प्रतिदिन के किराए पर लिए गए।
बागेश्वर में सीएफएल का किराया 200 रुपए प्रति दिन दिया गया। शासन के निर्देशों के बावजूद सरकारी पैसे को बैंकों में रखा गया। कैग ने चुनावों के दौरान खर्च के प्रबंधन को कमजोर बताया है। वर्ष 2012 की आडिट रिपोर्ट में कैग ने वर्ष 2009 से लेकर वर्ष 2012 तक के बीच हुए चुनावों के प्रबंधन की जांच की है।
पढ़ें, प्रदेश के मुखिया की कुर्सी के लिए छिड़ा घमासान
इससे संबंधी रिपोर्ट में प्रदेश की निर्वाचन व्यवस्था पर भी कई सवाल उठाए हैं। कैग के मुताबिक वर्ष 2009 से लेकर वर्ष 2012 के बीच मतदाता सूची की तैयारी और प्रिंटिंग पर करीब 23 करोड़ रुपए खर्च किए गए। वर्ष 2004 में प्रदेश सरकार ने तय किया था कि एक मतदान केंद्र पर तंबू, बैरिके डिंग, फर्नीचर और प्रकाश आदि पर 80 हजार रुपए से ज्यादा खर्च नहीं किया जाएगा।
पढ़ें, अब 11 वीं में ही बनें आईटी और आटोमोबाइल इंजीनियर
वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में 11 जिला निर्वाचन कार्यालयों ने ठेकेदारों और फर्मों को 137 लाख रुपए का भुगतान किया। यह निर्धारित राशि 42 लाख से 95 लाख रुपए अधिक था। इस पर खुद मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने भी गंभीर चिंता जाहिर की थी।
कैग ने सीईओ कार्यालय में कार्मिकों की कमी पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि लंबे समय तक सहायक मुख्य निर्वाचन अधिकारी तैनात ही नहीं किए गए। इस पर सरकार का कहना है कि लगातार चुनाव की व्यस्तता के कारण रिक्त पदों को नहीं भरा जा सका।
पढ़ें, पोस्ट आफिसों से किसी भी वक्त निकाल सकेंगे पैसा
विभाग में फिलहाल 33 कार्मिकों की कमी है। कैग का यह भी कहना है कि कई मामलों में टीडीएस काटा ही नहीं गया औरबैंक खातों का संचालन भी किया गया, जबकि स्पष्ट प्रावधान है कि सरकारी पैसे को पीएलए या आहरण वितरण अधिकारी के खाते में रखा जाए न की बैंकों में। छह जिलों केअधिकारी सरकारी पैसे को बैंकों में जमा कर रहे हैं।
फेसबुक पर राय देने के लिए क्लिक करें...