प्रतिबंध के बावजूद गंगा किनारे गगनचुंबी व्यावसायिक इमारतें अवैध रूप से सिस्टम के देखते-देखते खड़ी हो गई हैं। व्यवसायी बेधड़क कूड़ा कचरा गंगा में बहा रहे हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 90 के दशक में गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के उद्देश्य से गंगा के दोनों ओर 200 मीटर में किसी भी प्रकार के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था। एक जनहित याचिका पर नैनीताल हाईकोर्ट ने वर्ष 2000 के बाद गंगा किनारे निर्मित वैध-अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने का आदेश वर्ष 2012 में दिया था।
इसके बाद राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने वर्ष 2015 में भी गंगा के दोनों और 100 मीटर में निर्माण संबंधी गतिविधियों को प्रतिबंधित करने के साथ ही पॉलिथीन तथा प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन सप्तऋषि से लेकर ज्वालापुर तक एक सौ मीटर के प्रतिबंध के बाद भी लगातार गगनचुंबी इमारतों का निर्माण लगातार जारी है।
गंगा में बढ़ रहा है प्रदूषण
गंगा में बढ़ रहा है प्रदूषण
गंगा की निर्मलता, अविरलता बनाए रखने के नाम पर केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे योजना का लोकार्पण हुए भी सात जुलाई को एक साल पूरा हो चुका है। इससे पहले लोकायुक्त के आदेश पर गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाए रखने के लिए गृह विभाग पुलिस के दायित्व निर्धारित कर चुका है। इसके लिए जल पुलिस की टीम भी कागजों में नियुक्त की जा चुकी है।
जल पुलिस का काम है कि गंगा नदी में मानव, पशु का शव, कूड़ा कचरा, सीवर ड्रेनेज न प्रवाहित करने दे, कपड़े धोने एवं खुले में शौच की प्रवृति को रोकना सुनिश्चित करे और गंगाघाटों पर भिखारियों, शराबियों एवं सुलफा, चरस पीने वालों सहित झोपड़ पट्टी के निवासियों को गंगा नदी किनारे मलमूत्र करने से रोकने, जूठे खाद्य पदार्थ गंगा नदी में फेंकने पर रोक लगाए। इन सारी व्यवस्थाओं और नियमों के होते हुए भी गंगा में प्रदूषण कम होना तो दूर बढ़ता ही जा रहा है।
हरकी पैड़ी और उसके आसपास के घाटों पर पॉलिथीन लगातार बेची जा रही है। इन क्षेत्रों स्थित खाने के होटलों और लंगरों पर शाम को बच जाने वाला खाना रात के अंधेरे में गंगा में डाल दिया जाता है। हरिद्वार में गंगा के किनारे उद्योग तो नहीं है लेकिन रेलवे सटेशन के पीछे स्थित पुराने औद्योगिक क्षेत्र की कई फैक्ट्रियों का अपशिष्ट लगातार नालों के जरिये गंगा में गिर रहा है, जबकि कई गंदे नाले भी लगातार जारी है।