देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले जौनसार बावर के वीर केसरी चंद ने दिल्ली जेल में अपने पिता से कहा था कि मेरी शहादत पर मातम नहीं मनाना, आंखों से आंसू मत निकालना। यह उनके अंतिम शब्द थे।
आजाद हिंद फौज के सिपाही के रूप में अंग्रेजों से लोहा लेने वाले देश के वीर सपूत को 3 मई 1945 को फांसी दी गई थी। आज (एक नवंबर) को उनकी जयंती के अवसर पर चौलथात के रामताल गार्डन स्थित शहीद स्मारक पर उनको श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी।
स्वतंत्रता आंदोलन में प्राणों की आहुति देने वाले रणबांकुरों में जौनसार बवार क्षेत्र के क्यावा गांव के वीर केसरी चंद भी शामिल थे। खत सैली के क्यावा गांव में 1 नवंबर 1920 को पंडित शिवदत्त के घर वीर केसरी चंद का जन्म हुआ था। नेताजी सुभाष चंद बोस के नेतृत्व में उन्होंने महज 24 वर्ष की आयु में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाए थे।
केसरी चंद के अंदर बचपन से ही देशभक्ति का जज्बा था। गांव में प्राथमिक शिक्षा के बाद केसरी चंद 12 वीं की पढ़ाई के लिए डीएवी इंटर कॉलेज देहरादून गए। उन्होंने बीच में ही पढ़ाई छोड़कर 10 अप्रैल 1941 को
रॉयल इंडियन आर्मी सर्विस कॉर्प में बतौर सूबेदार ज्वाइन की। द्वितीय विश्व युद्ध में उनको मोर्चे पर भेजा गया। इस बीच केसरी चंद ने नेताजी के आह्वान पर आजाद हिंद सेना में शामिल हो गए। वर्ष 1944 को बर्मा होते इंफाल पहुंचे। यहां अंग्रेजी हुकूमत ने केसरी चंद को बंदी बना लिया। इस महानायक पर देशद्रोह का मुकदमा चलाते हुए ब्रिटिश सरकार ने 12 फरवरी 1945 को फांसी की सजा का फरमान सुनाया और 3 मई 1945 को फांसी पर लटका दिया।