उम्र नहीं, सोच महत्वपूर्ण
मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सीएमएस रावत ने कलम सिंह रावत के इस निर्णय की सराहना करते हुए कहा कि 82 वर्ष की उम्र में भी उनकी समाज के प्रति सोच प्रेरणादायी है। उन्होंने कहा कि देहदान केवल शरीर का दान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की चिकित्सा शिक्षा में योगदान है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा के क्षेत्र में अध्ययनरत विद्यार्थियों के लिए मानव शरीर की संरचना को प्रत्यक्ष रूप से समझना बेहद महत्वपूर्ण है। देहदान के माध्यम से कोई व्यक्ति मृत्यु के बाद भी चिकित्सा शिक्षा और मानव सेवा से जुड़ा रह सकता है।
मृत्यु अंत नहीं, किसी और के काम आने का अवसर
कलम सिंह रावत के साथ मेडिकल कॉलेज पहुंचे पंडित सत्यानंद डंगवाल ने कहा कि कलम सिंह ने यह निर्णय किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि इस भावना से लिया है कि उनके जाने के बाद भी उनका शरीर समाज के काम आए। उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले समाज में मानव सेवा और परोपकार की भावना को मजबूत करते हैं।