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नोटबंदी पर भाजपा खामोश, विपक्षी हमलावर

Fri, 03 Feb 2017 12:22 PM IST
मेहताब आलम/ अमर उजाला, हरिद्वार
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कैश
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बीते साल के आखिर में नोटबंदी के फैसले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। उस समय भाजपा ने भले ही इसे कालेधन के खिलाफ लड़ाई में बड़ा हथियार बताया हो, लेकिन फिलहाल भाजपा के चुनाव प्रचार से यह मुद्दा  पूरी तरह गायब है।
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बैनर और पोस्टरों से लेकर भाजपा नेताओं के भाषणों तक में नोटबंदी का जिक्र नहीं है। वहीं कांग्रेस और बसपा नोटबंदी के साइड इफेक्ट याद दिलाकर वोटरों को साधने का प्रयास कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि नोटबंदी से फायदे और नुकसान को लेकर भाजपा संशय की स्थिति में है।
    
स्विस बैंकों सहित विदेशी खातों में जमा कालेधन का मुद्दा कई सालों से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा। भाजपा ने लोकसभा चुनाव के प्रचार में इसे बड़ा मुद्दा बनाया और कालाधन वापस लाने का भरोसा भी दिलाया। इसके बाद बीते आठ नवंबर को अचानक प्रधानमंत्री मोदी की ओर से एक हजार और पांच सौ रुपये का नोट बंद करने का ऐलान करने से कालेधन का जिन बोतल से बाहर आ गया।
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शुरूआत में शांत रहा विपक्ष आखिर तक इसे मुद्दा बनाकर केंद्र सरकार और भाजपा पर हमलावर रहा। यहां तक की संसद का शीतकालीन सत्र भी नोटबंदी पर हंगामे की भेंट चढ़ गया। चुनाव से पहले तक यह माना जा रहा था कि नोटबंदी जैसे ऐतिहासिक फैसले को भाजपा अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास करेगी, लेकिन फिलहाल तक के चुनाव प्रचार में नोटबंदी लगभग भाजपा के प्रचार से गायब है। कुछ बड़े नेता संभलकर कभी कभार नोटबंदी की बात जरूर छेड़ रहे हैं, अलबत्ता निचले स्तर पर मतदाताओं से जनसंपर्क और छोटी छोटी नुक्कड़ सभाओं में नोटबंदी का नाम नहीं लिया जा रहा है।
    
हाईवे से लेकर शहर के अंदरूनी मार्गों पर लगे विशाल होर्डिंग और बैनर पोस्टरों पर सिर्फ बदहाल उत्तराखंड की तस्वीर पेश की गई है। परिवर्तन का आह्वान करते हुए विकास का भरोसा दिलाया गया है, पर नोटबंदी सिरे से गायब है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नोटबंदी के मुद्दे पर भाजपा भ्रम की स्थिति में है। भाजपा नेताओं इस बात पर आश्वस्त नहीं है कि उन्हें नोटबंदी का मुद्दा वोटरों के बीच लाकर उन्हें फायदा होगा या नुकसान। वहीं कांग्रेस में नोटबंदी को लेकर प्रचार गीत तक बनवाए गए हैं।

निजी कर्मचारियों के लिए नोटबंदी बड़ा मुद्दा     
नोटबंदी से यूं तो हर वर्ग प्रभावित हुआ है, लेकिन सिडकुल सहित निजी उद्योगों में कार्यरत कर्मचारियों को इसकी ज्यादा मार झेलनी पड़ी। उत्पादन घटने पर कर्मचारियों को छंटनी का शिकार होना पड़ा। स्थानीय परिपेक्ष्य में देखा जाए तो सिडकुल की आसपास की कालोनियों में नोटबंदी का मुद्दा हावी रहेगा। यहां बड़ी संख्या में निजी कर्मचारी निवास करते हैं। इसे भांपते हुए कांग्रेस, बसपा और निर्दलीय प्रत्याशी नोटबंदी का मुद्दा जोर शोर से उठा रहे हैं।
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