जिस जमीन को लोगों ने बंजर बताकर छोड़ दिया, उस पर कुछ किसानों ने अपनी मेहनत और नवोन्मेषी प्रयोगों के चलते ‘सोना’ उगा दिया।
कई लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के साथ ही उन्होंने पानी की कमी, गिरते उत्पादन और जानवरों से होने वाले नुकसान के चलते पहाड़ों में खेती छोड़ रहे किसानों को नई राह दिखाने का काम भी किया है। इन किसानों ने अपने जीवट के जरिये न केवल बंजर जमीन को हरा-भरा कर दिया बल्कि अपने साथ कई अन्य लोगों को रोजगार भी उपलब्ध कराया है।
इनमें से एक हैं, लोहाघाट, चंपावत निवासी भुवन चंद्र मुरारी। 2007 तक वह प्राइवेट नौकरी करते थे। कमर की तकलीफ के चलते उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। चार साल तक वह रोजगार के लिए भटकते रहे। 2011 में उन्होंने लोहाघाट में अपनी जमीन पर औषधीय पादपों की खेती शुरू की। इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली।
ऐसे में किसी ने उन्हें फूल उगाने की सलाह दी। वह दिल्ली गए और वहां से दस हजार रुपये का ग्लेडियोलस फूल का बीज खरीद लिया। तैयार फूलों को उन्होंने दिल्ली में बेच दिया। इससे उन्हें करीब डेढ़ लाख रुपये की आय हुई। इससे उन्हें नया हौसला मिला। वापस पहुंचकर उन्होंने आसपास की करीब सौ नाली जमीन लीज पर ली।
यह जमीन पूरी तरह बंजर थी, जहां घास भी नहीं उगती थी। ऐसे में लोगों ने वह जमीन मामूली किराये पर उन्हें सौप दी। उन्होंने ग्लेडियोलस के साथ ही लिलियम की खेती भी शुरू कर दी। साल में दो बार खेती करने के लिए उन्होंने पॉली हाउस भी लगा लिया। बसों के जरिये वह फूलों को दिल्ली बेचते हैं, जहां उन्हें अच्छी खासी कीमत मिलती है। कभी नौकरी के लिए भटकने वाले भुवन अब फूलों की खेती के जरिये कई लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दे रहे हैं।