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गजबः जहां घास नहीं उगती थी, वहां ‘सोना’ उगा दिया

Mon, 06 Mar 2017 12:35 PM IST
अनिल चन्दोला/ अमर उजाला, देहरादून
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भुवन चंद्र मुरारी
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जिस जमीन को लोगों ने बंजर बताकर छोड़ दिया, उस पर कुछ किसानों ने अपनी मेहनत और नवोन्मेषी प्रयोगों के चलते ‘सोना’ उगा दिया।
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कई लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के साथ ही उन्होंने पानी की कमी, गिरते उत्पादन और जानवरों से होने वाले नुकसान के चलते पहाड़ों में खेती छोड़ रहे किसानों को नई राह दिखाने का काम भी किया है। इन किसानों ने अपने जीवट के जरिये न केवल बंजर जमीन को हरा-भरा कर दिया बल्कि अपने साथ कई अन्य लोगों को रोजगार भी उपलब्ध कराया है।

इनमें से एक हैं, लोहाघाट, चंपावत निवासी भुवन चंद्र मुरारी। 2007 तक वह प्राइवेट नौकरी करते थे। कमर की तकलीफ के चलते उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। चार साल तक वह रोजगार के लिए भटकते रहे। 2011 में उन्होंने लोहाघाट में अपनी जमीन पर औषधीय पादपों की खेती शुरू की। इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली।
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ऐसे में किसी ने उन्हें फूल उगाने की सलाह दी। वह दिल्ली गए और वहां से दस हजार रुपये का ग्लेडियोलस फूल का बीज खरीद लिया। तैयार फूलों को उन्होंने दिल्ली में बेच दिया। इससे उन्हें करीब डेढ़ लाख रुपये की आय हुई। इससे उन्हें नया हौसला मिला। वापस पहुंचकर उन्होंने आसपास की करीब सौ नाली जमीन लीज पर ली।

यह जमीन पूरी तरह बंजर थी, जहां घास भी नहीं उगती थी। ऐसे में लोगों ने वह जमीन मामूली किराये पर उन्हें सौप दी। उन्होंने ग्लेडियोलस के साथ ही लिलियम की खेती भी शुरू कर दी। साल में दो बार खेती करने के लिए उन्होंने पॉली हाउस भी लगा लिया। बसों के जरिये वह फूलों को दिल्ली बेचते हैं, जहां उन्हें अच्छी खासी कीमत मिलती है। कभी नौकरी के लिए भटकने वाले भुवन अब फूलों की खेती के जरिये कई लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दे रहे हैं।  
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घाटे की खेती छोड़ फूल उगाए

- फोटो : file photo
धौंतरी गांव उत्तरकाशी निवासी जगवीर सिंह राणा टैक्सी ड्राइवर थे। 1999 में एक दुर्घटना में उनकी आंखों और शरीर को नुकसान पहुंचा। वह रोजगार की तलाश में भटकते रहे, लेकिन उन्हें काम नहीं मिल पाया। 2007 में उन्होंने देखा कि लोगों ने नुकसान और जंगली जानवरों से हो रहे नुकसान के चलते खेती छोड़ दी।

उन्होंने बंजर हो चुके खेतों पर गेंदा उगाना शुरू कर दिया। उत्तरकाशी बाजार में वह गेंदा बेचने निकलते तो अच्छा खासा मुनाफा होने लगा। मंदिरों में पूजा-अर्चना और शादियों में सजावट के लिए उन्हें ऑर्डर मिलने लगे। पूरे परिवार के साथ ही उन्होंने अन्य लोगों को भी काम पर लगा लिया। करीब 60 से 70 हजार की आय से वह अपने साथ अन्य लोगों को भी रोजगार दे रहे हैं। साल में दो फसल लेने के लिए वह पॉली हाउस भी लगाने जा रहे हैं। 

मंदिर में श्रृंगार को उगाए फूल
उत्तरकाशी निवासी दिनेश भट्ट रैथल गांव में करीब पांच नाली भूमि में फूलों की खेती कर रहे हैं। दरअसल कुछ वर्ष पूर्व तक पास ही स्थित विश्वनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना और शृंगार के लिए फूल नहीं मिलते थे। देहरादून से आने वाले या आर्टिफिशियल फूलों से मंदिर में शृंगार होता था। ऐसे में दिनेश के मन में फूलों की खेती का ख्याल आया। उन्होंने खेतों के किनारे-किनारे फूल उगाने शुरू किए। इससे उन्हें 10 से 12 हजार की आय होने लगी। इससे प्रेरित होकर वह अब आस-पास के क्षेत्रों में भी फूलों की खेती को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रहे हैं।
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