सख्त प्रशासक के साथ बेदाग छवि वाले पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी के दम पर पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा अच्छे नतीजे लेकर आई, लेकिन खुद उन्हें कोटद्वार से मिली हार ने सत्ता कांग्रेस के हाथ थमा दी। अब मिशन 2017 में भाजपा के लिए एक बार फिर खंडूड़ी हैं जरूरी दिख तो रहे हैं, लेकिन उनकी उम्र के साथ पार्टी की बदली पॉलिसी उन्हें सीएम चेहरा बनाने को लेकर ऊहापोह की स्थिति में है। वे खुद भी उम्र सीमा की पैरवी करने वालों में शुमार हो चुके हैं। हालांकि किसी भी तरह की जिम्मेदारी मिलने से वह इंकार भी नहीं कर रहे हैं। यह भी तय है कि उनके लोकपाल, ट्रांसफर एक्ट और सिटीजन चार्टर के सख्त निर्णयों को पार्टी चुनावी एजेंडा बनाकर आगामी चुनाव में उतरेगी। राजनीति में उम्र सीमा तय करने से लेकर कांग्रेस सरकार की रणनीति और भाजपा के सीएम चेहरे को लेकर विशेष संवाददाता अरुणेश पठानिया के तीखे सवालों पर पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी ने बड़ी बेबाकी से जवाब दिए-
पिछले चुनाव में खंडूड़ी है जरूरी का नारा चला, इस बार आपकी क्या भूमिका रहेगी?
- उस वक्त चुनाव से पहले सात-आठ सीट भाजपा को आने की बात हो रही थी। मुझे तो तीन महीने कुछ दिन ही मिले। हम सख्त लोकपाल बिल लेकर आए, जो राष्ट्रपति से स्वीकृत होकर आया। अब तक अकेला बिल था, जिसमें मुख्यमंत्री भी जांच दायरे में आया। पहाड़ पर कर्मचारी अधिकारी भेजने को ट्रांसफर एक्ट बना। कुछ तो मेरी पृष्ठभूमि भाजपा ने देखी, खंडूड़ी इसीलिए जरूरी हुआ। लोगों में यह भावना पैदा हो गई कि शायद मेरे रहते हुए यह काम हो सकते हैं। पार्टी ने समझा होगा कि हम लोगों को बता दें कि अगर जीते तो इसी को सीएम बनाएंगे। तीन महीने में जो वातावरण बना उस दृष्टिकोण से पार्टी ने यह नारा दिया। हालांकि मैं कैसे हारा इसकी बात नहीं करना चाहता, लेकिन पार्टी को तो जीत मिली ही।
राजनीति में उम्र सीमा तय हो इसे आप कितना जरूरी मानते हैं?
- उम्र सीमा तय करना अब सैद्धांतिक रूप से बहुत जरूरी है। इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए। इस तरह के निर्णयों पर चिंता का विषय यह रहता है कि उसका सही से अनुपालन हो। सीमा तय करना गलत नहीं है। मोरार जी देसाई 80 पार होने के बाद पीएम बने और वे फिट भी थे, लेकिन वह अपवाद थे। ऐसे में अपवाद को आधार बनाने कीबजाए उम्र सीमा तय करना ज्यादा बेहतर है।
उम्र सीमा किसी सदन का सदस्य बनने के लिए क्यों नहीं तय होनी चाहिए, केवल पदों के लिए ही क्यों?
- एक आयु सीमा से अधिक आदमी लोकसभा और एक आयु सीमा से कम राज्यसभा में नहीं जाना चाहिए। मैं तो संसद में इसके लिए प्राइवेट बिल लाने वाला था। यह मेरा व्यक्तिगत मानना है कि राज्यसभा के लिए न्यूनतम 45 वर्ष आयुसीमा होनी चाहिए। अनुभवी लोगों को ही राज्यसभा में जाना चाहिए। इसी तरह लोकसभा के लिए अधिकतम आयु तय करने से नए लोगों को लगातार अवसर मिलते रहेंगे। उम्र के हिसाब से कामकाज पर असर पड़ता है। अपवाद को दरकिनार नहीं किया जा सकता है।
कांग्रेस के पास चेहरा है आपके पास क्यों नहीं है?
- थोड़ा आउटऑफ कंटेस्ट बोल रहा हूं। अगर कांग्रेस इस बात को कह दें कि हरीश रावत को मुख्यमंत्री नहीं बनाएंगे तो उनको कुछ अधिक वोट पड़ेंगे। और मैं उत्तराखंडी होने के नाते बोल रहा हूं कि अगर उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ा श्राप देना हो तो बोल दो कि हरीश रावत की सरकार दोबारा आए। हरीश रावत ने जनता के साथ कितना अन्याय किया है यह कांग्रेस जानती है। जब जनता को संदेश जाएगा कि फिर इसी ने आना है, तो जिनको फायदा हो रहा है वह तो हरीश रावत के पीछे लगेंगे, लेकिन बाकी आदमी तो बोल ही रहा है कि यह आ गया तो मर जाएंगे।
भाजपा बहुमत का दावा कर रही है तो चेहरा घोषित करने में क्या गुरेज है ?
- कोई जरूरी नहीं है। चेहरा देना सैद्धांतिक चीज नहीं है। चेहरा लाने का फायदा भी है, नुकसान भी है। राजनीतिक प्रक्रिया के तहत कोई पक्का कायदा नहीं है। सामान्य तौर पर तरीका यह है कि जो सदस्य चुने जाते हैं उनके कहने पर नेता सदन चुना जाना चाहिए।
बतौर सीएम आपको जिम्मेदारी मिलती है तो ?
मेरा मानना है कि पार्टी ने जितना मुझे दे दिया, इतना मैं कई जन्मों में नहीं पा सकता। पार्टी मुझको जो बोलेगी मैं वह करूंगा। पार्टी मुझे बोलेगी कि स्वीपर का काम करना है तो मैं करूंगा। पार्टी जिसे जिम्मेदारी देगी मैं उसके पीछे सिपाही की तरह चलूंगा। इतना मैंने जरूर कहा है कि अगर कोई गलत काम करेगा तो मैं उसका विरोध करूंगा। उम्र के हिसाब से जो पार्टी कर रही है ठीक कर रही है। अच्छा निर्णय है उसका सम्मान और मन से पालन करता हूं।
आरोप है कि पिछले विधानसभा चुनाव में आपके बांटे टिकटों में खामियों से पार्टी हारी?
- दो चीजें हैं। पहली बात तो यह है कि मैं जिम्मेदारी लेता हूं, उस समय मैं मुख्यमंत्री था। दूसरी बात मैंने जो उस समय निर्णय लिया वह मेरे हिसाब से हैं। कई चीजों में मैं पार्टी से सहमत नहीं होता। टिकट बांटने वाले मौके पर मेरी जिम्मेदारी थी। पृष्ठभूमि देखनी पड़ती है। मैं कभी नहीं चाहूंगा कि मैंने जिसे टिकट दिया है वह व्यक्ति हार जाए। यह भी देखना होगा कि जिसकी टिकट कटी वह क्यों कटी। कई बार मेरी बात पार्टी नहीं मानती लेकिन मैं पार्टी तो नहीं छोड़ सकता ना।
मार्च 2016 में हुई सियासी उठा-पटक में सब भाजपा नेता सक्रिय थे आपको छोड़कर ?
- हर आदमी का अलग-अलग सिद्धांत हैं। दृष्टिकोण है। यह चर्चा का विषय नहीं है कि उस दौरान मुझसे पूछा गया कि नहीं पूछा गया। यह जरूरी नहीं कि हर चीज में मेरी सहमति होनी चाहिए। जिन्होंने निर्णय लिया वह देश हित में लिया गया। मैंने पार्टी के अंदर क्या कहा यह आपको नहीं बता सकता। उसके बाद पार्टी ने जो निर्णय लिया मैं उसके साथ हूं। मेरी आदत है अगर मुझ से पूछा जाए तो ही बोलूंगा। जिन्होंने जो उचित समझा वह किया।
बागियों से भाजपा को कितना नुकसान या फायदा होगा?
- मैं जो कुछ मानता हूं वह आपको नहीं बता सकता। मैंने पार्टी के अंदर बोल दिया जो बोलना था। पार्टी ने जो निर्णय लिया, मैं शत-प्रतिशत उनके साथ हूं। पार्टी के निर्णय के बाद मेरी व्यक्तिगत राय गौण हो जाती है।
आप पर अब आरोप लगा रहा है कि बेटी के माध्यम से आप भी राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं?
- खंडूड़ी की बेटी है इसलिए ऐसा कहा गया। करीब 15 साल से बेटी ने जय दुर्गा नाम संस्थान चलाया हुआ है। पिछले लंबे अरसे से उत्तराखंड में काम कर रही है। उसने अपना काम किया है। राजनीति में आने का किसी को भी अधिकार है। चाहे खंडूड़ी की बेटी हो या न हो। उसकी योग्यता पर सब निर्भर है। मैं तो मुख्यमंत्री था उस समय तो मेरे कहने से सीटें बंट रही थी तभी लड़वा देता चुनाव। खंडूड़ी की बेटी है तो लोग निशाना साधेंगे, यह स्वाभाविक है। लोगों का कहना कोई अनुचित नहीं है, लोग कहेंगे ही।
नोटबंदी जैसा फैसला लागू करने के लिए क्या इतनी तैयारी काफी रही?
- नोटबंदी से पहले सर्जिकल स्ट्राइक बड़ा फैसला रहा। सर्जिकल स्ट्राइक में मालूम था कि क्या रिएक्शन वर्ल्ड प्लेटफार्म पर आएगा। सर्जिकल स्ट्राइक से पाकिस्तान को संदेश मिला जबकि नोटबंदी का फैसला दूरगामी परिणाम देने वाला है, जिसे लागू करने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति चाहिए। आप जानते हैं कि कोई आदमी आपकी तारीफ करने वाला नहीं है फिर भी निर्णय लेने को हिम्मत चाहिए। रही तैयारी की बात तो थोड़ी बहुत तकलीफ ऐसे फैसलों से होती है, लेकिन भविष्य सुधर जाता है।
यह कड़े निर्णय हैं या राजनीति से प्रेरित?
- इस तरह के फैसलों से किसी को फायदा होगा किसी को नुकसान होगा। बस आपका मन साफ होना चाहिए। अभी जो हरीश रावत रात दिन घोषणाएं कर रहे हैं वो सिर्फ दिखावे के लिए हैं जमीन पर कुछ नहीं है। एक है दिखावे के लिये करना और दूसरा जनहित में करना। मैंने खुद कड़े फैसले लेकर देखे हैं। शुरू में लोगों को तकलीफ हुई। बाद में लोगों को समझ आ गया कि फैसले उनके हित के लिए थे।