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कैंसर को मात देकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की परीक्षा की पास, पढ़ें भूपिंदर के संघर्ष की कहानी

Wed, 24 Oct 2018 04:15 AM IST
सोबन सिंह गुसांई, अमर उजाला, विकासनगर (देहरादून)
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रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के मैनेजर भूपिंदर त्रिपाठी
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तमाम कोशिशों के बावजूद सफल न होने पर जिंदगी से हार मानने वाले नौजवानों को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की अहमदाबाद ब्रांच में मैनेजर भूपिंदर त्रिपाठी के संघर्ष की कहानी पढ़ लेनी चाहिए।

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उनका संघर्ष विषम परिस्थितियों में न केवल जीवन जीने का जज्बा पैदा करता है, बल्कि आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है। वह साल 2016 में दिव्यांग श्रेणी में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की परीक्षा 93 प्रतिशत अंकों के साथ पास करने वाले पहले भारतीय हैं।

टाटा कंसलटेंसी सर्विस (टीसीएस) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर पद पर काम करने वाले भूपिंदर त्रिपाठी को करीब पांच साल पहले कैंसर हो गया था। इसके बाद आंखों की रोशनी भी चली गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

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ब्रेल लिपि सीखी और दोबारा मुकाम पाया

मंगलवार को वे हरबर्टपुर में द ग्रोइंग प्लांट्स की ओर से आयोजित कार्यक्रम में पहुंचे। भूपिंदर के पिता राजेंद्र नारायण त्रिपाठी गुजरात में 1974 बैच के आईआरएस अधिकारी रहे हैं। ऐसे में उनकी शिक्षा अच्छे स्तर पर हुई।

साल 2002 में वे सॉफ्टवेयर इंजीनियर बने और टीसीएस में जॉब करने लगे। साल 2012 में उन्हें रीढ़ की हड्डी का कैंसर हो गया, इसका पता लास्ट स्टेज में चला। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया तो मां लक्ष्मी त्रिपाठी ने उनसे कहा कि भूपिंदर ठीक हो सकता है, आप इलाज शुरू करें। इससे जिंदगी तो बच गई, लेकिन उनकी आंखों की रोशनी चली गई।

भूपिंदर ठीक होकर जब अस्पताल से बाहर निकले तो उनके लिए हर तरफ अंधेरा था। उन्होंने ब्रेल लिपि सीखी। दिन रात मेहनत की और नेत्रहीनों के लिए संचालित होने वाली परीक्षा में पहला स्थान पाया। साल 2015 में आरबीआई में उनकी जॉब लगी। साल 2016 में दिव्यांग श्रेणी में आईएमएफ की परीक्षा पास करने पर उन्हें मैनेजर पद पर प्रोन्नति दी गई।
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