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किचन गार्डन में लगे इस पौधे में छिपा है सेहत का 'खजाना'

Mon, 18 Jan 2016 08:42 AM IST
अरविंद सिंह/ अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के सेंटर फॉर एरोमेटिक प्लांट (कैप) के पादप विज्ञानियों ने बाजार में उपलब्ध कॉड लीवर आयल (मछली के तेल) का विकल्प एक पौधे में ढूंढ लिया है। वर्तमान में यह सिर्फ किचन गार्डन तक ही सीमित है।
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वैज्ञानिकों का दावा है कि ‘भंगजीरा’ पौधे के बीज और पत्तियों में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो कॉड लीवर आयल का बेहतर विकल्प है।

शोध के वैज्ञानिकों का दावा है कि यदि सरकार व दवा कंपनियां इस दिशा में पहल करें तो ‘भंगजीरा’ की व्यावसायिक खेती करके रोजगार के बेहतर अवसर पैदा किए जा सकते हैं। यही नहीं इससे मांस, मछली न खाने वालों को ओमेगा-3 व ओमेगा-6 का शुद्ध और बेहतर विकल्प भी मिल सकेगा।

‘भंगजीरा’ के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने भी कदम उठाए हैं। सरकार इसके व्यावसायिक उत्पादन के लिए गढ़वाल व कुमाऊं में क्लस्टर विकसित करने जा रही है। इस संबंध में मुख्यमंत्री द्वारा उद्यान विभाग के अधिकारियों को विस्तृत मसौदा तैयार कर देने को कहा गया है।
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क्या है ‘भंगजीरा’

वैज्ञानिकों के मुताबिक भंगजीरा (वैज्ञानिक नाम- पैरिला फ्रूटीसैंस) आमतौर पर उत्तराखंड की एक अल्प उपयोगी फसल है। वर्तमान में यह सिर्फ किचन गार्डन तक ही सीमित है। स्थानीय लोग भंगजीरा का उपयोग चटनी के रूप में करते हैं।

हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, कैंसर जैसी बीमारियों में फायदेमंद
कॉड लीवर आयल का उपयोग कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज को कम करने के अलावा उच्च रक्तचाप, हृदयरोगों, ओस्टियोआर्थराइटिस, मानसिक तनाव, ग्लूकोमा व ओटाइटिस मीडिया जैसी बीमारियों के इलाज में होता है।

मृत कोशिकाओं को हटाने के साथ-साथ कैंसर एवं एलर्जी में भी यह बेहद लाभकारी है। ओमेगा-3 फैटी एसिड कॉड लीवर के अलावा अन्य समुद्री मछलियों में भी पाया जाता है।
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कॉड लीवर आयल की तुलना में अधिक सुरक्षित

वैज्ञानिकों का दावा है कि भंगजीरा का प्रयोग कॉड लीवर आयल की तुलना में अधिक सुरक्षित है। वसीय तेलों से हानिकारक तत्व जैसे पारा इत्यादि के मानव शरीर में पहुंचने का खतरा रहता है।

इससे दूसरी बीमारियों की संभावना होती है। ‘भंगजीरा’ का तेल पूरी तरह शाकाहारी होने के साथ बेहद लाभकारी है।

‘भंगजीरा में ओमेगा-3, ओमेगा-6 प्रचुर मात्रा में पाए गए हैं। भंगजीरा का तेल कॉड लीवर आयल का बेहतर विकल्प हो सकता है। जरूरत है कि भंगजीरा का उत्पादन व्यावसायिक स्तर पर किया जाए। सरकार ने कुछ पहल की है जो सकारात्मक कदम है।’
- डॉ. नृपेंद्र चौहान (वैज्ञानिक प्रभारी, कैप)
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