कांग्रेस-भाजपा नेताओं का धुआंधार प्रचार और घर-घर जनसंपर्क भी भगवानपुर के उतने मतदाताओं को घर से नहीं निकाल सका, जितने 2012 के विधानसभा चुनाव में निकले थे।
सुरेंद्र राकेश के निधन से खाली हुई भगवानपुर विधानसभा सीट पर कुल 73.95 प्रतिशत मतदान हुआ। 2012 के चुनाव में 79.76 प्रतिशत वोट पड़े थे। कांग्रेस उम्मीद कर रही थी सुरेंद्र राकेश की जमीनी पकड़, कामकाज और पत्नी की सहानुभूति से मतदान प्रतिशत और बढ़ेगा।
लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भगवानपुर में मतदान प्रतिशत घटने का एक कारण बसपा-सपा जैसी पार्टियों का मैदान में न होना भी रहा। इन दोनों पार्टियों का हार्डकोर (प्रतिबद्ध) मतदाता जो कहीं ने कहीं संगठन से जुड़ा है, चुनाव में सक्रिय नहीं हुआ। 2012 में भाजपा का मत प्रतिशत बहुत कम था। कुल 78 हजार वोट में से भाजपा को मात्र दस हजार वोट मिले थे।
सपा-बसपा के कांग्रेस के पक्ष में खड़े होने से चुनाव कुछ हद तक एकतरफा सा दिखा रहा था। चुनाव में लोगों की दिलचस्पी कम होने का एक कारण ये भी हो सकता है। भगवानपुर विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में गांव आते हैं। वहां का किसान इन दिनों खड़ी फसल पर बेमौसम बारिश की मार और राहत-मुआवजे में उलझा हुआ है। लिहाजा ऐसे मतदाताओं ने भी मतदान से दूरी बनाई।
कांग्रेस ने राज्य में पूर्ण बहुमत पाने के लिए विधानसभा की 36वीं सीट को लेकर कोई कसर नहीं छोड़ी। मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ उनकी पत्नी और लोकसभा की प्रत्याशी रहीं रेणुका रावत, महासचिव बेटे आनंद रावत ने चुनाव को कांग्रेस के पक्ष में करने के लिए हरसंभव प्रयास किए।
प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय, सांसद राजबब्बर, पूर्व सांसद महेंद्र सिंह माहरा, पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, मंत्रियों में इंदिरा ह्दयेश, यशपाल आर्य, मंत्री प्रसाद नैथानी भी प्रचार में शामिल रहे। भाजपा ने भी इस चुनाव को बीते उपचुनावों में खोई प्रतिष्ठा से जोड़ा।
स्थानीय सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक डेरा डाले रहे। साथ ही सांसद भगत सिंह कोश्यारी, प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत, विधायक मदन कौशिक समेत भाजपा के पांचों विधायक भी सक्रिय दिखे। भाजपा इसी कोशिश में रही कांग्रेस सरकार के प्रति नाराजगी और भितरघात का लाभ उसे मिल सके।