भागीरथी इको सेंसिटिव जोन केंद्र सरकार के दो मंत्रालयों की सियासत में फंस गया है। इसमें एनजीओ की दखलंदाजी भी अड़ंगा बन रही है। जिस अधिसूचना की कमियों को दूर करने के लिए केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने संशोधित नया जोनल मास्टर प्लान तैयार करवाया था, उस पर जल संसाधन मंत्रालय ने अड़ंगा लगा दिया। केंद्रीय मंत्रालयों के इस रवैये से प्रदेश की दिक्कतें बढ़ रही हैं। अड़ंगेबाजी दूर करने के लिए प्रदेश शासन केंद्र पर दबाव बनाने की तैयारी में जुट गया है।
भागीरथी इको सेंसिटिव जोन के संबंध में एक जुलाई 2011 को जो ड्राफ्ट तैयार हुआ था उसमें भागीरथी का गौमुख से उत्तरकाशी तक का 135 किमी क्षेत्र शामिल था, लेकिन जो फाइनल नोटिफिकेशन जारी हुआ उसमें इसे 4179 वर्ग किमी कर दिया गया। इसी से दिक्कतें शुरू हुईं। इको सेंसिटिव जोन की बंदिशें लागू होने पर लोगों के भवन निर्माण, सड़कों, जल विद्युत परियोजनाओं, लैंड यूज के बदलाव आदि पर प्रतिबंध लग गया।
इसका नतीजा यह हुआ कि क्षेत्र के गांवों के लोग पलायन करने लगे और भूतिया कहे जाने वाले वीरान गांवों की संख्या बढ़ गई। इससे अंतरराष्ट्रीय सीमा असुरक्षित हो रही है। इस पर 31 अगस्त, 2016 को प्रदेश शासन ने मुख्य सचिव एस. रामास्वामी की अगुवाई में राज्य के विभिन्न विभागों, वाडिया हिमालय भू गर्भ संस्थान, जूलोजिकल सर्वे आफ इंडिया के विज्ञानियों के साथ केंद्रीय वन, पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ कमेटी के समक्ष अधिसूचना के प्रतिबंधों के संबंध में अपनी बात रखी।
इस पर विशेषज्ञ टीम ने लैंड यूज, स्लोप, जल विद्युत परियोजनाओं की स्थापना पर ढील दी और नया जोनल मास्टर प्लान तैयार करने के लिए कहा। नया संशोधित मास्टर जोनल एनजीटी और वन पर्यावरण मंत्रालय में प्रस्तुत कर दिया गया। अब जब जल संसाधन मंत्रालय की टिप्पणी लेने के लिए बैठक हुई तो मंत्रालय के सचिव शशि शेखर ने इसे मूल अधिसूचना के विपरीत बताकर आपत्ति कर दी।
सवाल यह है कि अधिसूचना के कतिपय प्रावधानों के मद्देनजर ही यह जोनल मास्टर प्लान तैयार किया गया था तो फिर इस पर आपत्ति किस आधार पर की गई। आपत्ति लगाने वाले सचिव 31 दिसंबर, 2016 को सेवानिवृत्त भी हो गए हैं। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को मास्टर प्लान पर निर्णय लेना है जल संसाधन मंत्रालय सिर्फ टिप्पणी कर सकता है तो इसे रिजेक्ट करने की बात कैसे हुई? मंत्रालय की आपसी सियासत प्रदेश के लिए दिक्कतें पैदा कर रही है। इस संबंध में प्रदेश शासन फिर केंद्र के पास जाएगा।
एनजीओ की भूमिका पर भी सवाल
भागीरथी इको सेंसिटिव जोन के मामले में मुद्दई केसर सिंह पंवार हैं। जल संसाधन मंत्रालय की बैठक में एनजीओ भी पहुंच गए। इस पर प्रदेश शासन के अफसरों ने सवालिया निशान लगा दिया। बैठक ज्यादा वक्त हुज्जत में गुजरा। एनजीओ के प्रतिनिधि बैठक में प्रदेश के विकास के मॉडल को गलत बताते रहे।