जल समस्या से निजात पाने के लिए टिहरी में चंबा क्षेत्र के जड़धार गांव द्वारा अपनाया गया ‘जल प्रबंधन’ हमारी बड़ी मदद कर सकता है।
गांव में कई पीढ़ी पूर्व पानी पंचायत गठित की गई है। पानी पंचायत गांव के हर खेतिहर किसान के खेतों तक जरूरत के हिसाब से पानी पहुंचाने की व्यवस्था करती है।
इंतजाम इतना पुख्ता कि पानी हर खेत तक पहुंचता है, किसी को शिकायत नहीं रहती। फसल भी भरपूर होती है।
कभी नहीं हुई पानी की किल्लत
जड़धार चार सौ परिवारों वाला हेंवलघाटी का सबसे बड़ा गांव है। गांव में कभी पानी की भारी किल्लत थी। कुदरत की देन थी कि हेंवल नदी गांव के पास से होकर बहती थी।
गांव वाले खुद ‘भगीरथ’ बने। हेंवल से गांव तक गूल (छोटी नहर) का निर्माण कर डाला। यहां तक तो ठीक।
अब समस्या यह थी कि गांव के हर खेत-खलिहान तक पानी कैसे पहुंचाया जाए जिससे किसी को शिकायत न रहे कि उसके खेत प्यासे रह गए।
क्योंकि गूलों के टेल (आखिरी छोर) तक पानी न पहुंच पाना आम समस्या होती है।
कई पीढ़ी पहले गठित हुई पानी पंचायत
जड़धार में कई पीढ़ी पहले पानी पंचायत गठित हुई थी। इतनी पुरानी है कि किसी को सन याद नहीं। पूछने पर गांव वाले कहते हैं कि उनके बाप-दादे के जमाने से पंचायत चल रही है।
हर साल पानी पंचायत और उसके मुखिया का चुनाव होता है। पंचायत से जुड़े ग्रामीण बारी-बारी से जरूरत के अनुसार गूल के जरिए खेतों तक पानी पहुंचाते हैं।
इसमें किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता है। पंचायत आबपासी (सिंचाई) का पैसा नहीं, अनाज लेती है, वह भी उपज के अनुसार। इकट्ठा हुआ अनाज सार्वजनिक जरूरतों के काम आता है।
ऐसे होता है खेतों में पानी का बंटवारा
पानी पंचायत के मुखिया कुंवर सिंह ने बताया कि पानी पंचायत का चुनाव गांव के लोग करते हैं। यह सामूहिकता के आधार पर चलती है।
पंचायत ही तय करती है कि खेतों को कब कितनी मात्रा में पानी दिया जाना है। इस बात का ध्यान रखा जाता है कि किसी ग्रामीण के साथ भेदभाव न किया जाए।
सभी ग्रामीणों के खेतों में सिंचाई का पानी समान मात्रा में पहुंचे, इसके लिए 15-20 खेतों का एक ग्रुप बनाया गया है। ग्रुप के हिसाब से गूल से पानी उन खेतों को दिया जाता है। उस दौरान अन्य खेत पानी नहीं ले सकते।