हरिद्वार। वीएलसीसी कंपनी ने जहां छह लाख लीटर सैनिटाइजर बाजार में उतारकर करोड़ों के वारे न्यारे किए वहीं जीएसटी की चोरी से लेकर आमजन की सुरक्षा के संग भी बड़ा खिलवाड़ किया है। जब सैनिटाइजर बनाने का लाइसेंस ही नहीं था, फिर भला कैसे उत्पादन किया गया।
जानकारी के अनुसार सैनिटाइजर बनाने में कई तरह के पदार्थों का इस्तेमाल होता है। कुछ पदार्थ के इस्तेमाल से बनने वाले सैनिटाइजर में आबकारी विभाग का कंट्रोल नहीं है, लेकिन कुछ पदार्थ ऐसे है, जिन पर महकमे का कंट्रोल है। अब सवाल यह उठता है कि छह लाख लीटर सैनिटाइजर किस पदार्थ से बनाया गया था।
इसका खुलासा तो देश भर में भेज दी गई सैनिटाइजर की बड़ी खेप की वापसी से ही हो सकता है। बड़ा सवाल यह है कि आमजन की सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ किया है। यही नहीं जीएसटी चोरी की बात भी साफ साफ दिखाई दे रही है। करोड़ों की रकम कंपनी ने डकार ली है। जिला आबकारी अधिकारी पवन कुमार सिंह ने बताया कि उच्च अधिकारियों को रिपोर्ट भेजी जा रही है। उसके बाद ही अग्रिम कार्रवाई की जाएगी।
सैनिटाइजर बनाने के इस प्रकरण में एक आबकारी निरीक्षक की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। चर्चा है कि निरीक्षक ने पर्दे के पीछे से बड़ा खेल खेला है। उसे यह जानकारी थी कि बिना लाइसेंस के ही सैनिटाइजर बनाया जा रहा है। आबकारी विभाग के कुछ अफसर को भी इसकी भनक थी।
एफआईआर दर्ज करने को लेकर चल रहा मंथन
सैनिटाइजर के गोरखधंधे को लेकर कंपनी प्रबंधन पर धोखाधड़ी समेत प्रभावी धाराओं में मुकदमा दर्ज करने की तैयारी है। अंदरखाने इस पर पूरा मंथन चल रहा है। दरअसल बिना लाइसेंस के सैनिटाइजर बनाना धोखाधड़ी की ही श्रेणी में आता है। इसके अलावा कंपनी एक्ट में भी कार्रवाई के प्रावधान तलाशे जा रहे हैं।
कंपनी ने जो सैनिटाइजन बनाया है, उसके लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं थी। कंपनी गुणवत्ता के साथ समझौता नहीं करती है और न ही आमजन की सुरक्षा के साथ कोई खिलवाड़ किया गया है। आबकारी विभाग की जांच में पूरी मदद की जा रही है।
- अशोक राजपूत, प्लांट हेड, वीएलसीसी सिडकुल