राज्य के सरहदी इलाकों के आसपास बावरिया गिरोह की पुष्टि होते ही जंगलों में आग लगनी शुरू हो गई है। यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि वन्य जीव तस्कर शिकार के लिए यह तरीका अपनाते हैं।
इस संबंध में इंटेलीजेंस भी अपनी रिपोर्ट में अंदेशा जाहिर कर चुकी है। इस रिपोर्ट के बाद वन्य जीवों की सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की गई। अब जब आग की घटनाएं हो रही हैं और बावरिया गिरोह की वनों में सक्रियता की सूचना है तो वन विभाग को आग की घटनाओं को कंट्रोल बर्निंग बता रहा है।
इस मौसम में बावरिया गिरोह उत्तराखंड के जंगलों में वन्य जीवों के शिकार के लिए आता है। जंगलों में आग लगा दी जाती है जिससे वन्य जीव वासस्थल छोड़कर भागते हैं और उनका शिकार कर लिया जाता है। नेशनल वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो ने हर साल की तरह इस साल भी अलर्ट जारी किया।
साथ ही बावरिया गिरोह के संबंध में इंटेलीजेंस वन विभाग को दो हफ्ता पहले रिपोर्ट दे चुका है। इसके बाद सबसे पहली आग नंदा देवी बायोस्फेयर में लगी। इस क्षेत्र में अन्य वन्य जीवों के अलावा कस्तूरी मृगों के भी वासस्थल हैं। नंदा देवी बायोस्फेयर के बाद प्रदेश के अन्य स्थानों पर भी आग की घटनाएं होने लगी हैं। ऐसे मौसम में जब प्रदेश के जंगल गीले हैं, चीड़ की पत्तियों (पेरुल) में नमी है तो आग कैसे लग रही? इस पर गौर करने के बजाए वनाधिकारी इसे कंट्रोल बर्निंग बताकर टाल रहे हैं।
भारतीय वन्य जीव संस्थान के विज्ञानियों का कहना है कि बर्फबारी और बारिश के इस मौसम में वन्य जीव बर्फीले क्षेत्रों से उतर कर नीचे आ जाते हैं। इन वासस्थल तय नहीं होता तो अक्सर दूसरे क्षेत्रों में निकल जाते हैं। नेशनल वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो ने इस मौसम में वन विभाग को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए थे।
इसके साथ ही स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड में भी जंगलों में आग लगाकर वन्य जीवों के शिकार की बात उठ चुकी है। फिर भी सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम नहीं किए गए। प्रमुख वन संरक्षक (वन्य जीव) डीबीएस खाती का कहना है कि वनों में अलर्ट जारी करने के साथ सुरक्षा के बंदोबस्त कर दिए गए हैं।