गोपेश्वर स्थित जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान ने प्रदेश में बद्री बेरी के व्यावसायिक उत्पादन के लिए पहल की है।
उच्च औषधीय गुणों वाला यह पेड़ ज्यादा ऊंचाई वाले ठंडे इलाके में पाया जाता है। इसके लिए हिमाचल के लाहौल स्फीति जिले से एक हजार पौधे मंगाए गए हैं। इनको एक सप्ताह के भीतर पिथौरागढ़ जिले के मुंश्यारी में रोपित किया जाएगा। विदेशों में इसकी ज्यादा मांग होने से प्रदेश के किसानों के लिए भी यह काफी लाभकारी साबित हो सकता है।
लाहौल स्फीति जिले के कुकुमश्री से इसकी पौध लाने गए जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. वीपी भट्ट ने बताया कि बद्री बेरी (वैज्ञानिक नाम- हिपोथी सॉलीसिफोलिया) औषधीय गुणों से भरपूर होने के अलावा भूमि की सेहत के लिए भी बहुत उपयोगी है। इसकी पत्तियां व फलों का रस निकालकर सत बनाया जाता है।
इससे बने उत्पाद प्रबल कैंसररोधी होने के अलावा डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, लीवर, पाचन तंत्र आदि से जुड़े रोगों में बेहद कारगर होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड ने इस पर अधिक शोध करने के लिए उन्हें प्रोजेक्ट दिया है। छत्तीसगढ़ के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कालेज, रायपुर ने जांच के बाद उत्तराखंड की बद्री बेरी को उच्च गुणवत्ता वाली घोषित किया है।
डॉ. भट्ट ने बताया कि दाल परिवार का न होने को बावजूद यह जमीन में नाइट्रोजन को बढ़ाता है। इसकी जड़ों में ऐसे तत्व होते हैं, जिनसे बेकार भूमि भी उर्वर बन जाती है। इसके अलावा यह भूमि का क्षरण रोकने में भी काफी मददगार साबित होता है। इसे अमेष, चूक, आमलीच आदि नामों से भी जाना जाता हैं।
उन्होंने बताया कि इसकी खेती के लिए ऊंचाई पर स्थित ज्यादा ठंडे इलाके उपयुक्त हैं, इसलिए प्रदेश के ऐसे इलाकों के किसानों के लिए यह वरदान साबित हो सकता है। क्योंकि इसके औषधीय गुणों के कारण अब विदेशों में भी मांग बढ़ी है। मुंश्यारी में एक हजार पौधे लगाकर इनसे कलम विकसित कर प्रदेश के उपयुक्त इलाकों के इन्हें रोपित किया जाएगा।
जांच के दौरान पाया गया है कि बद्री बेरी विभिन्न रोगों खासतौर पर कैंसर, डायबिटीज आदि में बेहद कारगर है। प्रोजेक्ट के तहत हमारे संस्थान में इस पर कार्य जारी है। हिमाचल से एक हजार पौधे मंगाकर लगाए जा रहे हैं। इससे ऊंचाई पर बसे किसानों को आमदनी का बेहतर जरिया मिल सकेगा।
- डॉ. वीएस नेगी, निदेशक, जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान