उत्तराखंड के गोपेश्वर में दशोली ब्लॉक के डुमक, कलगोठ, पल्ला, किमाणा, स्यूंण और बेमरू गांव के ग्रामीणों को अपने गांवों से सड़क तक पहुंचने में आज भी 20 किमी पैदल दूरी तय करनी पड़ रही है।
ग्रामीण बीते कई सालों से क्षेत्र को सड़क से जोड़ने की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन कोई सुध लेने को तैयार नहीं है। क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधा का भी अकाल बना हुआ है। कई बार गंभीर बीमार चिकित्सालय लाते वक्त रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
प्रतिदिन सात किमी पैदल
क्षेत्र के छात्र-छात्राएं इंटर स्तर की पढ़ाई करने के लिए प्रतिदिन सात किमी की पैदल दूरी तय कर किमाणा गांव पहुंचते हैं। इन गांवों को सड़क से जोड़ने के लिए 2010 में सैंजी लग्गा मैकोट-कुजौं मैकोट-बैमरु मोटर मार्ग का निर्माण कार्य शुरू हुआ।
लेकिन पिछले तीन सालों में सड़क आठ किमी तक ही बन पाई है। जबकि उक्त सड़क का निर्माण 32 किमी तक होना है। स्थानीय ग्रामीण आईएस सनवाल, उदय सिंह रावत, मोहन सिंह, विक्रम सिंह नेगी, कुलदीप और प्रताप का कहना है कि परेशान ग्रामीण अब आंदोलन का मन बना रहे हैं।
केस-1
वर्ष 2012 में स्यूंण गांव के सुरेंद्र सिंह की पुत्री गीता चट्टान से गिरकर घायल हो गई थी। जिसे ग्रामीणों द्वारा पालिकी में सड़क तक पहुंचाया जा रहा था, लेकिन 12 किमी आने के बाद भी त्वरित उपचार न मिलने के कारण गीता ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया था।
केस-2
वर्ष 2013 में कलगोठ गांव निवासी हुकम सिंह की तबियत अचानक बिगड़ गई। उन्होंने पेट में दर्द की शिकायत की, उन्हें उल्टियां भी हो रही थीं। ग्रामीणों ने उन्हें चारपाई में रखकर अस्पताल के लिए रवाना किया। लेकिन उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।
केस-3
वर्ष 2011 में स्यूंण गांव निवासी जगदीश सिंह की पुत्री ममता की भी एक रात अचानक तबियत बिगड़ गई, उसे चिकित्सालय लाया जा रहा था, लेकिन त्वरित उपचार न मिलने के चलते उसने भी रास्ते में ही दम तोड़ दिया।