रविवार को इससे पहले देव, ऋषि, सूर्य, अग्नि आदि को साक्षी मानकर सभी संन्यासियों का मुख्य विरजा होम और मुंडन संस्कार किया गया। 21 मार्च से नवनिर्मित ऋषिग्राम में संचालित चतुर्वेद महापारायण यज्ञ की पूर्णाहूति के पश्चात सभी संन्यासियों ने शोभायात्रा के साथ वीआईपी घाट के लिए प्रस्थान किया। गंगा स्वच्छता अभियान और नमामि गंगे परियोजना को ध्यान में रखते हुए सभी का मुंडन पतंजलि स्थित ऋषिग्राम में ही किया गया।
सांकेतिक रूप से सभी संन्यासियों ने शिखासूत्र व यज्ञोपवीत पतित पावनी गंगा के पावन जल में विसर्जित की। सभी ऋषि-ऋषिकाओं ने गंगा में स्नान के पश्चात श्वेत वस्त्रा त्यागकर भगवा वस्त्र धारण किए। उसके बाद बाबा रामदेव और संतों की ओर से 92 संन्यास दीक्षुओं को सिर पर पुरुषसुक्त के मंत्रों से 108 बार गंगा जल से अभिषेक कर पवित्र संन्यास संकल्प दिलाया।
इस अवसर पर बाबा रामदेव ने कहा कि संन्यासी होना जीवन का सबसे बड़ा गौरव है। अब से सभी 92 संन्यासी ऋषि परंपरा का निर्वहन करते हुए मातृभूमि, ऋषिसत्ता और अध्यात्मसत्ता में जीवन व्यतीत करेंगे। बाबा रामदेव ने कहा कि वे माता-पिता धन्य हैं जो अपनी संतानों को मातृभूमि के लिए समर्पित कर रहे हैं।
आचार्य बालकृष्ण ने संन्यास धर्म की मर्यादा का उल्लेख करते हुए कहा कि संन्यास संकल्प को सदा स्मरण रखते हुए सभी अविवेकपूर्ण कामनाओं और विषय भोगों से मुक्त रहकर संन्यासी होना दुनिया का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व व गौरव है।
उन्होंने कहा कि गुरु बनना आसान कार्य है, लेकिन एक शिष्य के रूप में गुरुधर्म और राष्ट्रधर्म का पालन करना कठिन कार्य है। एक संन्यासी के लिए गुरुनिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा व ध्येयनिष्ठा में निरंतरता बनाए रखना ही जीवन का प्रयोजन होना चाहिए।
भारत माता मंदिर के संस्थापक स्वामी सत्यमित्रानंद ने कहा कि गौतम बुद्ध, शंकराचार्य और समर्थ गुरु रामदास के बाद इतनी बड़ी सामूहिक संन्यास दीक्षा किसी ने नहीं दी। इसके लिए योगऋषि बाबा रामदेव को साधुवाद है।
उन्होंने कहा कि एक साथ इतनी बड़ी संख्या में संन्यासियों को देश सेवा में समर्पित करना रामराज्य की स्थापना, ऋषि परंपरा और भावी आध्यात्मिक भारत के स्वप्न को साकार करने जैसा है।
कार्यक्रम में वात्सल्य ग्राम की संस्थापक ऋतंभरा ने कहा कि धन्य है यह देवभूमि, गंगा के तट, वे परिवारजन और बहता हुआ गंगा का यह जल जो भारत की इस उज्ज्वल परंपरा का साक्षी बन रहा है। एक सच्चा संन्यासी वैदिक परंपरा को समर्पित होकर मां भारती की कोख को धन्य करता है।
भोगभुक्त होना भारत की परंपरा नहीं है, योगयुक्त होकर धन्य व कृतार्थ होना ही भारत की परंपरा है। कहा कि भगवा वस्त्र अग्नि की भांति हैं। इस अग्नि में तपकर संन्यासी का मन कुंदन बन जाता है।
सुत्तुर मठ, मैसूर कर्नाटक के जगद्गुरु शिवरात्री देशी केंद्र महास्वामी ने कहा कि भारतवर्ष में जन्म लेना, उसमें भी हिमालय की इस उपत्यका में प्रवास होना, उस प्रवास में भी हरिद्वार में बाबा रामदेव का सानिध्य होना और उस सानिध्य में भी बाबा से संन्यास की दीक्षा लेना गौरव की बात है।
इस अवसर पर साधना केंद्र आश्रम देहरादून के स्वामी प्रेम विवेकानंद ने कहा कि स्वामी विवेकानंद के अनुसार भारत की आत्मा का मूल तत्व आध्यात्मिकता है, गणित, विज्ञान, राजनीति व कला इत्यादि नहीं हैं। यदि एक बार उसकी आध्यात्मिकता की पवित्रता की पुन: प्रतिष्ठा हो जाए तो भारतीय समाज के सभी अंग अपनी पवित्रता को पुन: प्राप्त कर लेंगे।