हरिद्वार के कनखल स्थित शंकराचार्य मठ में शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती महाराज से पूर्व आईपीएस आचार्य किशोर कुनाल की रचित पुस्तक 'अयोध्या रीविजिटेड' का रविवार को विमोचन कराया।
पुस्तक में रामजन्म भूमि मंदिर के तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाने के तथ्यों को प्रकाशित कर उजागर किया है। शंकरचार्य ने पुस्तक को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि इससे जनता के सामने राम मंदिर, जन्मभूमि के तथ्य सामने आएंगे।
सेवानिवृत्त आईपीएस एवं केएसडी संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा के पूर्व कुलपति आचार्य किशोर कुनाल ने रामजन्म भूमि पर अयोध्या रीविजिटेड पुस्तक रचित की है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश जीबी पटनायक ने समीक्षा लिखी है। जिसमें उन्होंने लिखा है कि राष्ट्रीय धरोहर रही है। दोनों पक्षों मे उपजे विवाद का इस पुस्तक से समाधान निकलेगा। कनखल शंकराचार्य मठ में आचार्य किशोर कुनाल ने तथ्यों का उजागर किया।
वर्ष 1660 ईस्वी में औरंगजेब ने मंदिर तुड़वाने के लिए अपने गवर्नर फिदाईन खान को नियुक्त किया है। औरंगजेब ने तीन मंदिरों में स्वर्ग द्वार मंदिर, त्रेता का ठाकुर मंदिर और जन्मभूमि मंदिर को तुड़वा दिया। इसी ने यहां पर बाबरी मस्जिद बनवा दी।
इसके बाद यहां पर करीब 200 सालों तक मुस्लिमों और हिंदुओं में विवाद पैदा न हो, इसके लिए बराबर रूप में पूजा, परिक्रमा और नमाज होती रही। लेकिन इससे पूर्व में बाबर के बाद भ्रमित कराया गया कि एक गलत शिलालेख के कारण 200 साल से यह भ्रान्ति फैली रही है कि बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद का निर्माण करवाया था। अवध के तत्कालीन गवर्नर मीर बाकी ने 1528 में राम मंदिर को गिरा कर वहां पर बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था।
आस्ट्रिया के पादरी जोसेफ टीफेन थेलर देश में 1745 में आया। पादरी 1772 में अवध में भ्रमण करते रहे। जहां 1767 में अयोध्या में आए थे। उन्होंने रामजन्मभूमि का उल्लेख लिखते हुए अवगत कराया है कि औरंगजेब ने तीन मंदिर तुड़वाए थे। 1803 में फ्रांस के विद्वान सीमेंटल ने भी लिखा था कि औरंगजेब ने मंदिर तुड़वाए थे।
1813-14 में फ्रांस के बुकानन ने सर्वे किया तो सामने आया कि औरंगजेब ने अयोध्या, काशी, मथुरा आदि में मंदिर तुड़वाए और मस्जिद बनवाई थी। 1838 में एक पुस्तक छपी थी, उसमें लोग मानने लगे थे कि बाबर ने मस्जिद बनाई थी। लेकिन जिस शिलालेख के आधार पर फ्रांसिस बुकानन ने यह लिखा था वह कोई अंश नहीं था। इससे भ्रांतियां फैल गई।
इसके अलावा विद्वानों के अनुसार बाबर, अकबर, जहांगीर, शाहजहां उदार सम्राट रहे, लेकिन औरंगजेब अत्याचारी रहा। उसने धर्म के खिलाफ कार्य किए। तीन मीनार वाली मस्जिद औरंगजेब के कार्यकाल की है। जबकि बाबर में समयकाल में एक भी मस्जिद का कही भी नाम नहीं मिलता है। अकबर ने 1600 ईस्वी में साधु-संतों को अयोध्या में साढ़े सात एकड़ भूमि दी। इसे बाद 1723 ईस्वी में भूमि का नवीनीकरण भी हुआ।
1724 में मुगल सम्राट ने फिर साधुओ को भूमि दी। जो कि हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास के पास है। 1858 ईस्वी में अंग्रेजी शासक लार्ड डलहोजी ने वाजिद अली शाह को हटवा दिया था। उस समय माना गया कि अनादिकाल से रामजन्म भूमि की परिक्रमा होती रही थी। वहां पर 1858 में मस्जिद पर राम-राम लिख दिया गया था। जिसे बाद में हटवा दिया गया। करीब 200 सालों तक यही स्थिति रही।
पूजा-परिक्रमा और नमाज एक साथ
1858 ईस्वी में इसी विवादित स्थान पर मुसलमान नमाज पढ़ते थे और हिंदू पूजा, परिक्रमा दंडवत करते थे। अंग्रेजों ने 1858 ईस्वी में अवध के साम्राज्य को मिला लिया। अंग्रजों ने यहां पर पहला काम किया कि मुसलमानों को उत्तर दिशा से प्रवेश कराया और वे नमाज करने लगे। हिंदुओं को पूरब दिशा से आने रास्ता दिया गया और चबूतरा को बाहर कर दिया। हनुमानगढ़ी में शिलालेख मिले है, जिसमें रामजन्म भूमि और चबूतरा के सबूत मिले हैं।
जन्मभूमि का चित्र अंकित
राम का जन्म स्थान पहले से ही अंकित था। इसके चित्र भी जारी हुआ है। रामजन्म भूमि मंदिर का रुद्रयामल और सत्योपाख्यान ग्रंथ में उल्लेख है। बिट्रेन में मौजूद स्कंदपुराण के एक संस्करण में भी राम मंदिर का उल्लेख है। अवध विरासत में 17 वी सदी में भी उल्लेख है।