इसके बाद भी मार्ग दर्शक मंडल की कुल पांच बैठकें हरिद्वार के अग्रसेन आश्रम और कच्छी आश्रम में हुई। इन बैठकों में मंदिर निर्माण की रूपरेखा रची गई। गंगा की इसी नगरी में देश भर में भ्रमण करते हुए मंदिर निर्माण के लिए शिलाएं इकट्ठा करने का निर्णय हुआ। इसके पश्चात देशभर से शिला पूजन कराकर मंदिर के लिए ईंटें ग्रहण करने का काम शुरु हुआ।
हरिद्वार में दो धर्म संसद और हुईं। इन दोनों के आयोजनों में देश भर से आए शंकराचार्य, माधवाचार्य, रामानुजाचार्य, रमानंदाचार्य तथा षड़दर्शन संत उपस्थित हुए। कार सेवा में घीसापंथी संत आचार्य जगदीश मुनि का बड़ा योगदान रहा, जो आज इस दुनिया में नहीं हैं।