उत्तराखंड विधान सभाध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल विपक्ष के निशाने पर रहते हैं। बतौर अध्यक्ष सरकार के पक्ष में टिप्पणियां करने को संविधान के विशेषज्ञ पीठ की गरिमा से जोड़कर देखते है। उन पर सीएम हरीश रावत के ‘यस मैन’ होने का बड़ा आरोप है।
पीठ पर बैठकर भी वह कांग्रेस का मुखौटा ओढ़े रहते हैं। कभी उनका नाम विधानसभा में होने वाली नियुक्तियों में भाई भतीजावाद फैलाने के साथ जोड़ा जाता है तो कभी सदन में विपक्ष के हंगामों के दौरान सरकार का पक्ष लेने का आरोप लगता है। दलबदल कानून के तहत नौ विधायकों को सदन से बाहर का रास्ता दिखाने वाले विधानसभाध्यक्ष का मानना है कि 18 मार्च को सदन में जो कुछ घटित हुआ उससे उन्हें बहुत दुख पहुंचा है लेकिन संवैधानिक पीठ पर आसीन होने के नाते अपने निर्णय को सही भी ठहराते हैं।
उनका गैरसैंण से लगाव सियासी से अधिक भावनात्मक है। गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने के प्रबल पक्षधर कुंजवाल स्थाई राजधानी पर सरकार को कई बार कटघरे में खड़ा कर चुके हैं। विधानभवन बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की गिरती सियासी सोच से लेकर नैतिक मूल्यों में भारी गिरावट उनकी बढ़ी चिंताओं में एक है। पेश से विधानसभाध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल और अमर उजाला संवाददाता अरविंद सिंह के बीच बातचीत के कुछ अंश।
सवाल - कहा जाता है कि आप पर सीएम हरीश रावत का ‘यस मैन’ है?
जवाब - देखिए ये आरोप सरासर गलत है। बतौर विधानसभाध्यक्ष मैने न सिर्फ हरीश रावत सरकार वरन इससे पहले विजय बहुगुणा की अगुवाई वाली सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए। सरकार को कटघरे में खड़ा किया। मैंने सीएम हरीश रावत समेत सरकार के सभी मुखिया को रास्ता दिखाने का काम किया। सदन की कार्यवाही के दौरान पूरी निष्पक्षता से काम किया। जो लोग आज मुझ पर सीएम रावत का यस मैन होने का आरोप लगा रहे हैं उन्होंने ही सदन में कहा था कि ‘अध्यक्ष जी आपका स्वभाव ऐसा है कि आप राज्य की सभी 70 विधानसभाओं में से जहां भी चुनाव लड़ेंगे, जीत आपकी होगी, वही आज अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं। ’
सवाल- सदन के भीतर कई बार मारपीट, हंगामा तक हो गया। आप मानते हैं कि बतौर अध्यक्ष आप असफल रहे?
जवाब- सदन के भीतर जो कुछ भी घटित हुआ उसके लिए पीठ से कोई चूक नही हुई। राजनीतिज्ञों की राजनीतिक सोच में बदलाव आया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे के प्रति अपराधियों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। सदन के भीतर आमजन से जुड़े जिन मुददों पर जनप्रतिनिधियों को चर्चा करनी चाहिए उससे लोग दूर होते जा रहे हैं। विपक्ष किसी भी चर्चा के दौरान पहले से मन बनाकर बैठा होता है कि सरकार का विरोध करना ही है। ऐसे में सदन के भीतर विवाद की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है। जिसके लिए पीठ को कतई जिम्मेदार नही ठहराया जा सकता है।
सवाल - आप विधानसभा अध्यक्ष है लेकिन अक्सर आपकी सियासी मुद्दों खासकर गैरसैंण को सार्वजनिक मंच से टिप्पणियां आती हैं। आपके बयान के चलते कई बार सरकार असहज हुई। जब स्थितियां बिगड़ी तो आप सरकार को बचाने में जुट गए। ऐसा क्यों?
जवाब- देखिए गैरसैंण प्रकरण से राजनीतिक लाभ लेने जैसी कोई बात ही नही है। जिन बातों को लेकर उत्तराखंड का गठन हुआ यदि उन बातों की अनदेखी होगी तो मुझे बेहद दुख होगा। यहां की विषम भौगोलिक परिस्थितियोें को लेकर यदि सरकार चिंता नही करेगी तो कौन करेगा। यद्यपि मेरा मानना है कि राज्य गठन के बाद विकास तेजी से हुआ है। कई मामलों में पूरे देश में अव्वल है। जबकि कई चीजों में हम अन्य राज्यों की तुलना में आगे हैं। मेरा मानना है कि राजधानी का मुद्दा उलझाकर रख दिया गया है। साथ ही यह भी मानता हूं कि यदि राजधानी पहाड़ में बने तो न सिर्फ पलायन रुकेगा वरन समृद्धता भी आएगी। साथ ही देश की सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
सवाल - भाजपा की माने तो पीठ पर बैठे होने के बाद भी आप पर कांग्रेस का मुखौटा हैं?
जवाब - भाजपा के इन आरोपों में कोई दम नही है। चूंकि मै कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचा और फिर सर्वसम्मति से विधानसभाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर आसीन हुआ। विधानसभाध्यक्ष मनोनीत होते समय भाजपा की भी सहमति थी। मैने बतौर विधानसभाध्यक्ष पूरी निष्पक्षता से अपने दायित्वों का निर्वहन किया। मै अपने द्वारा निभाएं गए दायित्वों को लेकर पूरी तरह संतुष्ट हूं। बाकी राजनीति है आरोप प्रत्यारोप तो कुछ भी लगाया जा सकता है।
सवाल - आप पर नियुक्तियों में भाई भतीजावाद के आरोप हैं?
जवाब- यह आरोप सरासर गलत है। निहित स्वाथोँ के चलते कुछ लोग यह आरोप लगा सकते हैं। मैने जिंदगी में कभी भी कोई गलत काम नही किया। जहां तक बतौर विधानसभाध्यक्ष भाई भतीजावाद को बढृावा देने का सवाल है तो मैने नियमानुसार कदम उठाया है। विधानसभा के एक संयुक्त सचिव की नियुक्ति को लेकर कुछ आरोप लगाए गए। लेकिन मै कहना चाहूंगा कि जिन अधिकारी को लेकर सवाल खड़ृे किए जा रहे हैं वह प्रतिनियुक्ति पर सचिवालय में तैनात किया गया है। यदि कोई कुंजवाल है तो मेरी जाति का होने की वजह से मेरा सगा संबंधी नही हो जाता है।
सवाल - अरुणाचल प्रदेश के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बतौर विधानसभाध्यक्ष कैसे देखते हैं?
जवाब- देखिए, 18 मार्च को सदन में जो कुछ भी घटित हुआ। वह दुर्भाग्यपूर्ण है। मै किसी का नाम नही लेना चाहूंगा लेकिन प्रकरण में जो भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि शामिल हैं प्रदेश की जनता उन्हें कभी भी माफ नही करेगी। विधानसभाध्यक्ष होने के नाते मेरे सम्मुख याचिका प्रस्तुत की गई। विधानसभा कार्य संचालन नियमावली के तहत निर्णय लिया गया। पहले विधायकों को सात दिन का नोटिस दिया गया उसके बाद निर्णय लिया गया। हमारे निर्णय को पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीमकोर्ट ने सही ठहराया। अरुणाचल प्रदेश के प्रकरण में विधानसभाध्यक्ष ने गलत निर्णय लिया। उसी का परिणाम है कि अदालत का निर्णय उनके निर्णय के उलट गया।