विधानसभा चुनाव की तैयारी का बिगुल फूंक चुकी कांग्रेस को चुनावी रणनीति के मामले में दो नावों की सवारी करनी पड़ रही है। एक तरफ पूर्व सीएम हरीश रावत हैं जो अपनी पूर्व की सरकार से वर्तमान सरकार की तुलना करना चाहते हैं तो दूसरी तरफ प्रदेश कांग्रेस त्रिवेंद्र सरकार के खिलाफ नाराजगी को भुनाने की कोशिश में है।
प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच चुनावी बिगुल तो भराड़ीसैंण में गैरसैंण, भराड़ीसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित होने के साथ ही फूंक दिया गया था। राजधानी के कार्ड का इस्तेमाल ही रहा कि कोविड काल में त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार को कांग्रेस से तीखे सुरों का दंश झेलना पड़ा। अब चुनावी मोड में आई कांग्रेस ने अपने नेताओं को एक मंच पर एकत्र भी कर लिया है। समर्थक कुछ भी कहें, लेकिन नेता फिलहाल एक-दूसरे की पीठ थपथपा भी रहे हैं।
इन सब के बीच चुनावी रणनीति है जिस पर अभी कांग्रेस को प्रदेश में कम से कम एकजुट होना ही है। पूर्व सीएम हरीश रावत साफ तौर पर कांग्रेस की उनकी सरकार और वर्तमान सरकार के बीच तुलना होते हुए देखने की कोशिश में हैं। रावत के मुताबिक पीएम ने जब यह कहा कि लोकल के लिए वोकल हो जाएं तो लोगों के जेहन में पूर्व कांग्रेस सरकार ही आई होगी। पहाड़ी खीरे की पार्टी से लेकर कोदा-झंगोरा की बात करते हुए हरिद्वार में गंगा की धारा के विवाद को उन्होंने खुद ही हवा दी थी।
दूसरी तरफ प्रीतम सिंह की अगुवाई वाली प्रदेश कांग्रेस यह महसूस कर रही है कि वर्तमान प्रदेश सरकार से कोरोना काल में लोग अब और नाराज हो गए हैं। ग्रीष्मकालीन राजधानी का जवाब स्थायी राजधानी है, कोविड में क्वारंटीन सेंटरों की बदहाली, धड़ाम होती अर्थव्यवस्था के बीच बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई आदि मुद्दे हैं।
इन मुद्दों को लेकर कांग्रेस 23 सितंबर को विधानसभा सत्र के बीच धरना प्रदर्शन भी करने जा रही है। साफ है कि प्रदेश कांग्रेस त्रिवेंद्र सिंह रावत की कमियों को भुनाने की रणनीति पर काम कर रही है। इन दो धाराओं के बीच अब कांग्रेस के नए प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव को तालमेल की चुनौती से भी जूझना होगा। वे पहली रणनीति पर अमल करते हैं या दूसरी यह अभी भविष्य के गर्भ में है।