भर्ती रैली में पहाड़ के युवाओं में वो दम नहीं दिखा जिसकी सेना को दरकार है। पैदल चलने के अभ्यस्त युवाओं के कदम एक मील की दौड़ को समय रहते नहीं नाप पाए। जो समय रहते दौड़ भी लिए, उनके लिए कद की परीक्षा चुनौती बनी।
पांच फीसदी युवा ही सफल हुए
मैदानी क्षेत्रों के मुकाबले लंबाई में चार सेंटीमीटर की राहत भी काम नहीं आई। इसके बाद जो कद के बैरियर को लांघे उनका सीना मानकों पर खरा नहीं उतरा। कुल चार से पांच फीसदी युवा ही इन पड़ावों को पार करने में सफल हुए।
उत्तराखंड के युवाओं में सेना भर्ती को लेकर उत्साह तो खूब है, लेकिन सेना के मानक उनके शारीरिक दमखम पर भारी पड़ रहे हैं। शनिवार को टिहरी, उत्तरकाशी से पहुंचे साढ़े 10 हजार युवाओं में से महज 437 का चयनित होना दर्शा रहा है कि युवाओं की तैयारी पूरी नहीं है।
80 फीसदी से अधिक युवा तो एक मील की दौड़ को 5.40 मिनट से पहले तो दूर, अधिकतम 6.06 मिनट में भी पूरा नहीं कर पाए। दौड़ पार करने वाले कई युवा कद में मात खा गए। मैदानी जिलों के निवासियों के लिए जहां 170 सेंटीमीटर न्यूनतम ऊंचाई है, वहीं पर्वतीय जिलों के लिए 166 सेंटीमीटर है।
पहाड़ के युवाओं के लिए कद के अलावा 77 सेंटीमीटर चौड़ी छाती का न्यूनतम मानक पार करना भी भारी पड़ा।
सैन्य भर्ती अधिकारियों का कहना है कि 77 सेंटीमीटर का मार्क पार करने वाले युवा बेहद कम हैं, लेकिन नियमों में कोई शिथलता नहीं बरती जा सकती। हालांकि उनको अपील का मौका दिया जाता है, जिसके बाद दोबारा कद, वजन और छाती मापने का प्रावधान है।
ग्राउंड तक नहीं देख पाए कई युवा
भर्ती रैली के लिए सेना ने बेहद तकनीकी ढंग से व्यवस्था कर रखी है। पहले पड़ाव से रैली ग्राउंड तक एक किलोमीटर का फासला है। ग्राउंड पर पहुंचने से पहले एक कद का बैरियर लगा है, जिसमें निर्धारित मानक से पांच सेंटीमीटर नीचे का गेट है।
कद छोटा होने की वजह से कई अभ्यर्थी इस गेट को पार नहीं कर पाए और इस वजह से ग्राउंड में पहुंचने से पहले ही बाहर हो गए।