महिलाएं अब अबलाएं नहीं अपराजिताएं हैं। वे अपने खिलाफ होने वाले हर अपराध और उत्पीड़न से खुद निपटने में सक्षम हैं। समाज में तमाम तरह की विकृतियों के चलते महिला अपराधों में बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है, जो महिला अपराधों के खिलाफ पूरी शिद्दत से लड़ रहा है। उनकी नजर में बेटा और बेटी एक समान हैं। अमर उजाला अपराजिता 100 मिलियन स्माइल महाअभियान के तहत शुक्रवार को पटेलनगर स्थित अमर उजाला कार्यालय में ‘उत्तराखंड में महिला अपराध’ विषय पर संवाद में महिलाओं ने यह राय रखी।
महिलाओं ने प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर चिंता व्यक्त की। साथ ही इसके कारणों पर मंथन किया और रोकथाम के लिए अपने सुझाव भी साझा किए। महिलाओं ने एक स्वर में कहा कि जब तक समाज में महिलाओं को अबला माना जाएगा, उन पर होने वाले अपराध कम नहीं होंगे। महिलाओं को अपराजिता बनकर खुद अपराधों के खिलाफ खड़ा होना होगा, जिसमें पूरे समाज को उनकी ढाल बनना होगा। महिलाएं खुद में सक्षम और सशक्त हैं। हर मोर्चे पर उन्होंने अपनी काबिलियत और क्षमताओं को साबित भी किया है।
उन्होंने कहा कि समाज के दुष्प्रभावों के कारण महिलाओं के खिलाफ अपराधों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। देहरादून जैसे शांत शहर में इस तरह की घटनाओं में वृद्धि हुई है। यही नहीं, पहाड़ों में तक महिलाओं के खिलाफ अपराध हो रहे हैं। इनमें से बहुत से मामले ऐसे हैं, जिनमें अपराधी कोई परिचित ही है। ऐसे में महिलाओं के सामने समस्या यह है कि वे किसी पर भरोसा करें तो कैसे। महिलाओं ने कहा कि प्रत्येक परिवार से महिलाओं को सक्षम और सशक्त बनाने की शुरूआत करनी होगी। इसके बाद स्कूल-कॉलेज स्तर पर भी इस तरह के कार्यक्रम व अभियान चलाने होंगे, जिससे महिलाएं अलग-अलग तरह के अपराधों के खिलाफ लड़ने में सक्षम हों। स्कूलों में आत्मरक्षा के लिए नियमित रूप से ताइक्वांडो, मार्शल आर्ट, कराटे जैसी ट्रेनिंग देने की व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही हर परिवार को अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने चाहिए। बेटी को बताएं कि वह बाहर जाकर क्या करे और क्या न करे। लेकिन साथ ही बेटों को भी महिलाओं को सम्मान देने का संस्कार देना होगा। उन्हें सिखाना होगा कि जैसा सम्मान वह अपने घर में मां व बहनों को देते हैं, वैसा ही सम्मान उन्हें बाहर समाज में दूसरी महिलाओं को भी देना होगा।
मी टू पर सबकी राय जुदा
महिलाओं ने संवाद में मी टू अभियान पर भी खुलकर राय रखी। कुछ महिलाओं ने इसे महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि अपने साथ हुए उत्पीड़न के खिलाफ वर्षों बाद भी वह लड़ने को तैयार हैं। हो सकता है उस समय वह इतनी सक्षम और समर्थ नहीं रही होंगीं कि उस अपराध के खिलाफ लड़ सकें। लेकिन आज जब वह लड़ने की स्थिति में आई हैं तो उन्होंने आवाज उठाई। वहीं, कुछ महिलाओं ने इसे गलत परंपरा बताया। उन्होंने कहा कि वर्षों बाद इस तरह के आरोप लगाना गलत है। इसकी आड़ में कई गलत व झूठे आरोप भी लगाए जा रहे हैं। उन आरोपों को अब सही या गलत भी नहीं ठहराया जा सकता। इन प्रकरणों से महिलाओं की छवि भी प्रभावित हुई है।
हमारी कहानियों में हमेशा पुरुषों को हीरो दिखाया जाता है। महिलाएं केवल अबला ही दिखती हैं। जबकि ऐसा नहीं है। हमारे इतिहास, वेद-पुराण सबमें महिलाओं के सशक्तिकरण के उदाहरण मौजूद हैं। हमें उन कहानियों को नए सिरे से पढ़ने की जरूरत हैं।
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चारु बहुगुणा शर्मा, निदेशक, इंस्टेंट ऑक्सीजन
पहले बच्चे संयुक्त परिवार में पलते-बढ़ते थे। उन पर पूरे परिवार और समाज की नजर होती थी। पिछले कुछ वर्षों में माता-पिता के पास तक बच्चों के लिए समय नहीं रह गया है। परिवार या समाज में लोग एक-दूसरे से कोई मतलब नहीं रहता। ऐसे में बच्चा क्या करता है, घर वालों को पता तक नहीं होता।
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मंजू जैन, सामाजिक कार्यकर्ता
समाज में पिछले कुछ वर्षों में कई सकारात्मक बदलाव आए हैं, लेकिन महिलाओं की स्थिति बहुत ज्यादा नहीं बदली। आज भी परिवार में महिलाओं पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं। बेटियों को बाहर जाने की इजाजत नहीं है। हम अपनी बेटियों और महिलाओं को सुरक्षित माहौल देने में नाकाम रहे हैं।
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ममता थापा, सामाजिक कार्यकर्ता
महिला अपराधों की रोकथाम के लिए कड़े कानून बनाए जाने की आवश्यकता है। साथ ही पूरी कानूनी प्रक्रिया को आसान भी बनाया जाना चाहिए। महिला अपराधों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट होनी चाहिए। जब ऐसे अपराधियों को सजा मिलेगी, तभी मामलों में कमी आएगी।
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शीला नेगी, शिक्षिका, जीजीआईसी कारगी
पढ़ी-लिखी महिलाएं भी जागरूक होने के बावजूद ज्यादतियां सहती हैं। तमाम कारणों से वह कुछ भी नहीं कहती। कई बार परिवार या समाज की बेड़ियां उन्हें रोकने का काम करती है। उन्हें अपने खिलाफ होने वाले अपराधों की जानकारी है, लेकिन वह लड़ने का साहस नहीं जुटा पाती।
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नीलम शर्मा, प्रधानाचार्या, द इंडियन एकेडमी
महिलाओं को जागरूक करने के लिए समय-समय पर अभियान व कार्यक्रम चलाए जाने की आवश्यकता है। समाज को भी नैतिक शिक्षा देने की आवश्यकता है। महिला अपराध की रोकथाम पूरे समाज की जिम्मेदारी है, इसलिए सबको मिलकर इसके खिलाफ खड़ा होना होगा।
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कनक परासर, निदेशक, ए एंड के
हर महिला किसी न किसी रूप में शोषण का शिकार हो रही है। शोषण केवल शारीरिक नहीं मानसिक भी होता है। बहुत बार महिलाओं को कमतर आंका जाता है। उन्हें काम में भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। कई बार पुरुष नहीं चाहते कि महिलाएं आगे आकर काम करें।
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गगनजोत मान, एमडी, दून इंटरनेशनल स्कूल
महिलाओं के आवाज न उठाने के कारण ही अपराधों और अपराधियों को बढ़ावा मिलता है। समय रहते अगर कोई लड़ने का साहस दिखाए तो शायद किसी की दोबारा अपराध करने की हिम्मत नहीं होगी। अपने लिए महिलाओं को खुद ही आगे आकर लड़ाई लड़नी होगी।
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नमिता ममगाई, सामाजिक कार्यकर्ता
बच्चों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से दिया जाना चाहिए। स्कूलों में बेटियों के लिए सेल्फ डिफेंस का प्रशिक्षण हर हाल में होना चाहिए। अगर बेटियां खुद जवाब देने में सक्षम होंगी तो किसी की हिम्मत नहीं वो शोषण करने का साहस जुटा पाए। जब हम कमजोर होंगे, तभी हम पर अपराध होंगे।
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प्रियंका सिंघल, निदेशक, गुलाब स्वीट्स
बेटियों से ज्यादा बेटों को नैतिक शिक्षा देने की जरूरत है। घर में उनको सिखाया जाना चाहिए कि महिलाओं के साथ कैसा सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए। जो लोग अपने घर में महिलाओं को सम्मान देंगे, वह बाहर की महिलाओं को भी उसी सम्मान की नजर से देखेंगे।
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सीमा कंवल, प्रबंधक, श्री आई केयर
घर में बच्चे जो सीखते हैं, वही बाहर आकर करते हैं। इसलिए सबसे पहले हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम घर का माहौल सभ्य और संस्कारित बनाएं। जो भी आदमी समाज में कोई अपराध या गलत काम करता है, वह अपने परिवार के संस्कारों का भी परिचय देता है।
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सोनिया बंसल, निदेशक, ऋषि कंप्यूटेक
लड़की हो या लड़की, उसे संस्कारवान बनाने की पहली जिम्मेदारी परिवार की है। आज बच्चों के पास इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है। वह स्कूल और घर से बाहर बहुत ज्यादा समय बिताते हैं। वह वहां क्या सीखते हैं, इस पर भी नजर रखना जरूरी है। परिवार सुधारेंगे तभी बच्चे सुधरेंगे।
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डा. रेखा चौधरी, आयुर्मैक्स अस्पताल
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ कहने की क्या जरूरत है। ऐसा लगता है जैसे बेटियां कमजोर हैं। बेटी बचाना और पढ़ाना भी वैसा ही जरूरी है, जैसा बेटे को। बेटियां कमजोर नहीं है, जो उनके लिए नारों या स्लोगन की बैशाखी का इस्तेमाल करना पड़े। बेटियां उतनी ही मजबूत हैं, जितने बेटे।
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सुमिता भाटिया, निदेशक, ए ब्लेज लाइट्स
महिलाओं को आमतौर पर शारीरिक रूप से कमजोर समझा जाता है। महिलाएं खुद ही छोटे-मोटे अपराध और उत्पीड़न की शिकायत नहीं करती। कई बार यह उनके लिए ही घातक होता है। महिलाएं कभी न कमजोर थी न हैं। महिलाओं ने हर बार इसे साबित करके दिखाया है।
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विभा कपूर, सामाजिक कार्यकर्ता
समाज से पहले हमें अपने घर से शुरूआत करनी पड़ेगी। अगर मैं अपने बच्चों को संस्कार नहीं दे पाई तो समाज को सुधारने का ठेका कैसे ले सकती हूं। अगर मैं अपने बेटे को नहीं सिखा पाई कि उसे महिलाओं से कैसे बात करनी है तो सड़क चलते किसी दूसरे आदमी को कैसे बता पाऊंगी।
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अंजली उनियाल, निदेशक, फिल्मेटिक पैकेजिंग
महिलाओं को अपने खिलाफ होने वाले अपराधों के खिलाफ खुद लड़ना होगा। कई बार अपराधी केवल इसलिए बचे रह जाते हैं क्योंकि महिलाएं खुद कुछ नहीं करतीं। वह अपराध के खिलाफ चुप रहती हैं। ऐसे में अपराधियों के हौसले बुलंद हो जाते हैं। महिलाएं लड़ें तो किसी की हिम्मत नहीं होगी।
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स्वप्निल, निदेशक, रिवायत
महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामलों में पुलिस और अन्य एजेंसियों को भी उदार होकर काम करने की जरूरत है। कई बार पुलिस का रवैया इतना ज्यादा खराब होता है कि पीड़िता खुद उनके पास जाने या शिकायत करने से बचती है। इसे बदला जाना चाहिए ताकि पीड़िता मदद के लिए जा सके।
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तृष्शा, निदेशक, रिवायत
नौ माह की बच्ची से लेकर 90 साल की महिला के साथ तक यौन अपराध की घटनाएं हो रही है। साफ है हमारे समाज में इतनी ज्यादा विकृति आ चुकी है। समाज को संस्कारों से दूर होने का नुकसान झेलना पड़ रहा है। महिलाओं के खिलाफ होने वाले बहुत से अपराध इसी का नतीजा हैं।
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डा. गीता खन्ना, निदेशक, कृष्णा मेडिकल सेंटर