लेकिन तकनीकी युग में मशीनों ने हस्तशिल्प कारीगरों के हाथों से तैयार उत्पादों की मांग कम दी है। अब अधिकतर परिवारों ने परंपरागत कारोबार को छोड़कर नौकरी या अन्य व्यवसाय शुरू कर दिया है।
दशकों पूर्व तक ऊन से बने कालीन व कपड़ों की अच्छी मांग थी। लेकिन अब बाजार में हाथ से बुने इन उत्पादों की मांग कम हो गई है। नई पीढ़ी इस कारोबार में नहीं आना चाहती है। सरकार को परंपरागत हस्तशिल्प को बचाने के लिए ठोस प्रयास करने चाहिए। इस प्राचीन व्यवसाय को बढ़ावा मिलने से दूरदराज गांव से पलायन रूक सकता है।
-रमेश पांगती, गांव दरकोट, मुनस्यारी
हस्तशिल्प पुश्तैनी व्यवसाय था। शादी विवाह में दन, कालीन को गिफ्ट करने का रिवाज था। दन बनाने से फुरसत नहीं मिलती थी। सोफा सेट में बिछाने के लिए भी ऊन के दनों की अब डिमांड नहीं आती है।
- राजेश्वरी पांगती
ऊनी हस्तशिल्प की आज भी अलग पहचान है। मशीनों में निर्मित विदेशी सस्ते सामान के बाजार में आने से हस्तशिल्प को भारी नुकसान पहुंचा है। मांग नहीं होने से हजारों परिवारों ने दूसरा व्यवसाय शुरू कर दिया है। हस्तशिल्पियों को दन, कालीन और बाजार की मांग के अनुरूप सामान तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
-लीला बनग्याल, संचालिका, शिवालय महिला ऊनी हथकरघा हस्तशिल्प
उत्तराखंड में हथकरघा व हस्तशिल्प उद्योग में रोजगार की काफी संभावनाएं है। मेरा मानना है कि इन परंपरागत उद्योगों को भी मार्डन कर नया स्वरूप देने की जरूरत है। इसमें उत्पाद की डिजाइन व तकनीकी पर ध्यान देना होगा। हस्तशिल्पी क्या उत्पाद बना रहे हैं और बाजार की डिमांड क्या है। इस गेप को दूर करने के लिए सरकार को प्रयास करना चाहिए।
-पंकज गुप्ता, अध्यक्ष, इंडस्ट्री एसोसिएशन आफ उत्तराखंड
जनपद में प्राचीन समय से ही कालीन उद्योग स्वरोजगार का साधन था, लेकिन अब इनका प्रचलन कम हो गया है। बागेश्वर के मोहल्ला भोटिया पड़ाव, जीतनगर मंडलसेरा, बनखोला, नई बस्ती चौरासी समेत कांडा के ग्राम थाला, कपकोट के ग्राम फरसाली, शामा के कई लोग काली, मोजे, टोपी, स्वेटर, दन, मफलर, थुमला, कोट, जैकेट हथकरघा से बनाते थे। हस्तशिल्पियों को एक कालीन तैयार करने में महीना भी लग जाता है।
जिससे कालीन कीमत भी ज्यादा होती है। लेकिन अब हस्तशिल्पी महंगी कालीन खरीदने से बच रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह भी है कि बाजार में तीन, चार सौ रुपये तक की प्लास्टिक की दरियां, चटाई मिल रही है। इसकी वजह से कालीन व्यवसाय सिमटा रहा है। हस्तशिल्पी इस पुस्तैनी कारोबार को छोड़ कर दूसरा व्यवसाय अपनाने के लिए पलायन करने को मजबूर हैं।