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हिमालय पर मंथन से निकलेगा ‘अमृत’

Sat, 09 Sep 2017 10:31 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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himalaya
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उत्तराखंड सरकार हिमालय दिवस के बहाने पर्वतीय विकास को लेकर अलग नीति-नियोजन की आवाज को बुलंद करना चाहती है। ये आवाजें उठ तो रही हैं, मगर उतने प्रभावी तरीके से नहीं। इसकी वजह विकास का वह मॉडल है, जिसे लागू करा पाने में हिमालय राज्य कामयाब नहीं हो पाए हैं।
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अलग-अलग मंचों पर इसके लिए आवाजें उठती हैं, मगर वक्त के साथ ये दब जाती हैं। उत्तराखंड सरकार इस दिशा में एक नई पहल करने जा रही है। आवाज उठाने से पहले विकास के उस मॉडल की तलाश शुरू हो गई है, जो हिमालय राज्यों की समृद्धि का आधार बन सकता है। ये मॉडल कैसा होगा, इसके लिए प्रदेश सरकार ने एक शिखर सम्मेलन का आयोजन किया है। शनिवार से शुरू होने जा रहे इस दो दिवसीय सम्मेलन में विचारों के मंथन से सरकार उत्तराखंड ही नहीं हिमालयी राज्यों की समृद्धि के लिए अमृत खोजने की कोशिश करेगी। पेश हैं वे मुद्दे जिन पर अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञ एवं रोल मॉडल अपने विचार और अनुभव साझा करेंगे। इन अनुभवों और विचारों के जरिये सरकार अपनी विकास योजनाओं का स्वरूप तय करेगी।

पलायन की पीड़ा: हर परिवार से एक घर छोड़ गया
उत्तराखंड सरीखे पर्वतीय राज्य की सबसे बड़ी पीड़ा पलायन की है। 2011 की जनगणना के अनुसार पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा में पिछले एक दशक के दौरान आबादी घटी है। जनसंख्या में आई इस गिरावट की मुख्य वजह पलायन है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव और रोजगार के साधन की कमी की वजह से लोग घर छोड़ रहे हैं। गिरी सामाजिक संस्थान लखनऊ के एक अध्ययन के अनुसार, पहाड़ में कुल परिवारों के 88 प्रतिशत परिवारों में से कम से कम एक व्यक्ति रोजगार की तलाश में घर छोड़ गया। सम्मेलन में पलायन के कारणों की पड़ताल होगी।
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समृद्धि के आंकड़ों में पहाड़ का पिछड़ापन
उत्तराखंड में प्रतिव्यक्ति आय के आंकड़ों को समग्र रूप में देखने पर यहां लोग ज्यादा समृद्ध दिखाई देते हैं। मगर समृद्धि के आंकड़े जब पहाड़ और मैदान के बीच बंटते हैं, तो अंतर साफ-साफ नजर आने लगता है। राज्य के मैदानी जनपदों की प्रतिव्यक्ति आय जहां पौने दो लाख के पार हो चुकी हैं, वहीं पहाड़ के लोगों की इनकम एक लाख का आंकड़ा भी मुश्किल से छू पाई है।

आर्थिक विषमता की तस्वीर
पहाड़ में:
जनपद- प्रति व्यक्ति आय
उत्तरकाशी- 93025
बागेश्वर -    106933
रुद्रप्रयाग-    107976

मैदान में:
देहरादून-191064
हरिद्वार-190080
ऊधमसिंह नगर-179769
 
जैव विविधता: तरक्की आधार बनेगा प्रकृति का वरदान
प्रदेश में 63 फीसदी जंगल हैं। वन कानून और पर्यावरण की वजह से इसे विकास में बाधक माना जाता है। मगर अब सोच बदल रही है। यही बाधा आज जैव विविधता का वरदान बनी है। यूरोपीय संघ ने पर्यावरण की चुनौतियों का सामना जैव अर्थव्यवस्था से किया। इसी तर्ज पर उत्तराखंड भी आगे बढ़ने को बेताब है। सरकार का तकनीकी सुधार, कृषि, उद्यान, औषधि पादप विज्ञान और वानिकी को आर्थिकी का आधार बनाने पर जोर है। वह आधार क्या हो, विचारों के मंथन में यही खोजने का प्रयास होगा।
 
प्रदेश में सबसे ज्यादा वन भूमि
भूमि -हेक्टेयर-    प्रतिशत
वन -3799953 - 63
शुद्ध बोया गया-    701030-  12
कृषि योग्य बेकार -316898    -6
अन्य उपयोग की -222173    -4
स्थायी चारागाह-192098    -3
कुल परती भूमि-142921 -2
अन्य वृक्षों व बागों की-389183-5

उत्तराखंड दे रहा 31293 करोड़ की इको सर्विस
उत्तराखंड समेत सभी हिमालयी राज्य देश और दुनिया को पर्यावरणीय सेवाएं दे रहे हैं। इस इको सर्विस के एवज में राज्य को विशेष अनुदान की दरकार है। विकास योजनाओं की कीमत पर वह पर्यावरण की हिफाजत कर रहा है। पिछले एक दशक में राज्य की दो दर्जन से ज्यादा जल विद्युत परियोजनाएं लटकी हैं। पर्यावरण की अड़चन नहीं होती तो ये उत्पादन की स्थिति में आ जाती है राज्य को करोड़ों रुपये के राजस्व की प्राप्ति होती। भारतीय वन प्रबंध संस्थान, भोपाल की एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड 31293 करोड़ प्रतिवर्ष की इको सेवाएं दे रहा है।

बदलती जलवायु और बढ़ता खतरा
हिमालयी राज्यों पर आपदाओं का खतरा बहुत तेजी से बढ़ा है। उत्तराखंड राज्य 16 जून 2013 की आपदा से अब तक नहीं उबर पाया है। विशेष उस भीषण त्रासदी के लिए बदलती जलवायु को जिम्मेदार मानते हैं। उनकी निगाहों में हिमालय बेहद संवेदनशील है और उस पर दिखाई दे रहा असर जलवायु परिवर्तन के कारण है। जल संसाधन, वानिकी, आपदा एवं जोखिम प्रबंधन, ऊर्जा, कृषि, स्वास्थ्य, सड़क, परिवहन एवं पशुपालन के तौरतरीकों में ऐसे बदलाव की वकालत हो रही है, जो आपदा प्रतिरोधी क्षमता में बढ़ोत्तरी कर सकें।
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