नियमावली में यह प्रावधान भी किया गया है कि जांच अधिकारी तब तक दुर्घटनाग्रस्त वाहन को नहीं छोड़ेगा। जब तक न्यायालय इस बारे आदेश नहीं देगा। दुर्घटना में मृत्यु व स्थायी विकलांगता के दावे के मामले में भुगतान के लिए जब तक वाहन का पंजीकृत स्वामी प्रतिभूति राशि जमा नहीं करेगा, तब तक कोई भी न्यायालय वाहन को अवमुक्त नहीं करेगा।
विशेषकर उस स्थिति में जब वाहन के पास तीसरे पक्ष की जोखिम उठाने की बीमा पॉलिसी न हो। जहां वाहन से संबंधित बीमा पॉलिसी में तीसरे पक्ष के लिए जोखिम का प्रावधान नहीं है या उसकी बीमा पॉलिसी नकली पाई जाती है तो ऐसी स्थिति में न्यायिक मजिस्ट्रेट सार्वजनिक नीलामी में जब्त वाहन को छह माह के भीतर बेचकर उस धनराशि से दावे की धनराशि का भुगतान करेंगे।
उच्च न्यायालय के आदेश पर हुआ संशोधन
परिवहन विभाग ने यह संशोधन उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका पर आए आदेश के आलोक में किया। कोलकाता की दीपिका ने ये याचिका दायर की थी। उनके पति का नैनीताल में सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था। पुलिस ने दुर्घटना के संबंध में फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही मामले में आदेश दिया था कि पुलिस का जांच अधिकारी स्वत: दावे की रिपोर्ट तैयार कर दुर्घटना दावा अधिकरण को देगा। उत्तराखंड पुलिस ने मोटरयान अधिनियम की नियमावली के प्रावधान का हवाला दिया कि उसमें ये स्वत: रिपोर्ट देने का प्रावधान नहीं है। चूंकि इस मामले में केंद्रीय अधिनियम में खुद दावा रिपोर्ट तैयार करने का प्रावधान है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के आदेश देने के बाद मुख्य सचिव ने प्रति शपथ पत्र देकर नियमावली में संशोधन करने की बात कही थी।