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अमर उजालाा विशेष: उत्तराखंड की आबोहवा में वाकई हो रहा सुधार या आंकड़ों में झोल

Tue, 29 Jun 2021 09:55 AM IST
अलका त्यागी विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून

सार

तथ्य बता रहे हैं कि बीते पांच वर्षों में प्रदेश की जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। वाहनों की संख्या में चार सौ प्रतिशत तक की वृद्धि के साथ यह आंकड़ा 10 लाख को छूने वाला है।
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उत्तराखंड - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार
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घनी आबादी और वाहनों के बढ़ते दबाव में उत्तराखंड के शहरों की आबोहवा की शुद्धता पर बेशक सवाल उठते रहे हों, लेकिन राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की राय इससे जुदा है। बोर्ड के आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले पांच सालों में उत्तराखंड की हवा में प्रदूषण की मात्रा घट रही है।

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जबकि तथ्य बता रहे हैं कि बीते पांच वर्षों में प्रदेश की जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। वाहनों की संख्या में 400 प्रतिशत तक की वृद्धि के साथ यह आंकड़ा 10 लाख को छूने वाला है। बावजूद इसके वायु प्रदूषण में सुधार होना चौंकाता है। प्रश्न खड़ा होता है कि कहीं आंकड़ों में झोल तो नहीं है। कोरोनाकाल में कोविड कर्फ्यू के कारण वाहनों के पहिये जाम रहे।

ऐसे में प्रदूषण के स्तर में कमी आना स्वाभाविक माना गया, लेकिन आंकड़ों में बोर्ड पांच वर्षों से प्रदूषण में लगातार कमी की कहानी बयान करना पर्यावरण से जुड़े लोगों के भी गले नहीं उतर रही है। उनका  मानना है कि लगातार बढ़ते शहरीकरण, वाहनों की संख्या और औद्योगिक गतिविधियों के चलते वायु प्रदूषण की मात्रा बढ़नी चाहिए थी। बोर्ड की वेबसाइट पर जारी आंकड़ों के मुताबिक देहरादून और हल्द्वानी में गत पांच वर्षों में वायु प्रदूषण में लगातार सुधार हो रहा है। जबकि ऋषिकेश, काशीपुर और रुद्रपुर में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं है। हरिद्वार में जरूर वायु प्रदूषण के बढ़े हुए आंकड़े सामने आए हैं, लेकिन इन्हें भी असामान्य नहीं कहा जा सकता।
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हवा की शुद्धता का पैमाना
हवा की शुद्धता का पैमाना इसमें मौजूद श्वसनीय ठोस निलंबित कणों (रेस्पायरेबल सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर) यानी पीएम-10 और 2.5 की मात्रा के आधार पर मापा जाता है। वार्षिक औसत आधार पर पीएम-10 की मात्रा 60 से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसी तरह पीएम-2.5 की मात्रा वार्षिक आधार पर 40 से अधिक नहीं होनी चाहिए। वर्ष 2019 से पहले यहां केवल पीएम-10 के मानकों पर ही जांच की जाती थी। लेकिन 2019 में पीएम-2.5 के स्तर पर भी हवा में मौजूद कणों की भी जांच शुरू हो गई।

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बीते पांच वर्षों में पांच शहरों में पीएम-10 की स्थिति 

वर्ष             ऋषिकेश          हरिद्वार     हल्द्वानी        काशीपुर         रुद्रपुर 
2016            118               128         130             121                142
2017            129               101         125              115               124
2018           129                123         126              106               119
2019           136                131         111               126               129
2020            108                99          108               117               115

बीते पांच वर्षों में देहरादून के पीएम-10 की स्थिति 
वर्ष             घंटाघर     रायपुर       आईएसबीटी 
2016          180         245           288
2017          190          224          302
2018          176          161           265
2019          171          124           205
2020          137           80            144 

बीते दो वर्षों में देहरादून के तीन स्थानों पर पीएम-2.5 की स्थिति 
वर्ष            घंटाघर       रायपुर       आईएसबीटी 
2019          94             73              107
2020          84             68               84 

वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों में कहीं कोई झोल नहीं है। पीएम-10 और पीएम 2.5 की स्थिति यदि सुधरी है तो इसके कई कारण हो सकते हैं। पहले की अपेक्षा अब वाहन कम धुंआ उगलते हैं, उनकी तकनीक में काफी हद तक सुधार हुआ है। सड़कें भी पहले से बेहतर हो गई हैं। वाहनों के धुएं के अलावा धूल के कण भी वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारक बनते हैं। इसके अलावा औद्योगिक क्षेत्र में भी पहले के मुकाबले नियमों का सख्ती से पालन कराया जा रहा है।
 - एसएस सुबुद्धि, सदस्य सचिव, उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 

जब पूरे देश में वायु प्रदूषण की मात्रा लगातार बढ़ रही है, तब उत्तराखंड में वायु प्रदूषण का लगातार कम होना आश्चर्यचकित करता है। यहां भी देश के अन्य प्रदेशों की तरह कूड़ा, वाहन, उद्योग और वायु प्रदूषण को बढ़ाने वाले अन्य कारकों में तेजी से इजाफा हुआ है। इस लिहाज से जो आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं और वायु प्रदूषण के मापने की प्रक्रिया पर उत्तराखंड सरकार को किसी नामित राष्ट्रीय एजेंसी से सलाह लेनी चाहिए।  
- अनूप नौटियाल, अध्यक्ष, सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीस फाउंडेशन
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