वयोवृद्ध नत्थी सिंह रौथाण कहते हैं कि वे अपनी जड़ों से दूर नहीं जाना चाहते थे, पर हालात ने गांव छोड़ने को मजबूर कर दिया। वर्ष 2004 में पांच किमी दैजीमांडा-पौड़ीखाल मोटर मार्ग की मंजूरी मिली थी।
विभाग की ओर से इस मार्ग के गहड़खाल तक विस्तार का प्रस्ताव शासन को भेजा गया, लेकिन सड़क ढाई किमी बनने के बाद आगे नहीं बढ़ी। सड़क नहीं होने से मूलभूत जरूरतों की उम्मीदें दम तोड़ने लगीं। फिर रही-सही कसर जंगली जानवरों ने पूरी कर दी। छोटी सी जरूरत के लिए भी 79 की उम्र में चार किमी खड़ी चढ़ाई तय करना उनके लिए संभव नहीं रहा।
गांव छोड़कर शहरी इलाकों में शिफ्ट हुए रिटायर्ड शिक्षक मोहन सिंह रौथाण, त्रिभुवन सिंह चौधरी, गोविंद सिंह चौधरी और बीरेंद्र चौधरी का कहना है कि प्रदेश सरकारों और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं।
वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने पर उम्मीद जगी थी कि गांवों के दिन बहुरेंगे। सड़क, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी होंगी, पर किसी ने सुध नहीं ली। वहीं गुलदार समेत अन्य जंगली जानवरों का आतंक अलग से, ऐसे में गांव नहीं छोड़ते तो क्या करते।