1994 में उत्तराखंड आंदोलन ने जोर पकड़ लिया। सरकार का दमन चक्र शुरू हो गया। अमर उजाला एक बार फिर उत्तराखंड की भावनाओं के उफान का साक्षी बना। सरकार के रवैये और पुलिस की बर्बरता की दास्तानों से निकला सच अमर उजाला के पन्नों पर उतर आया । ये क्रूर व्यवस्था के खिलाफ जनता के संग खड़े अमर उजाला का हल्ला बोल था। कर्फ्यू के बहाने अमर उजाला के वितरण तक पर रोक लगा दी गई। उस कठिन दौर में भी अमर उजाला सच की आवाज बनकर घर-घर तक पहुंचा। सुदूर पहाड़ों पर भी वाहनों में छिपाकर अखबार के बंडल पहुंचाए जाने लगे थे। अमर उजाला के पाठक कर्फ्यू में छिप-छिपाकर बंद दुकानों के शटर के नीचे से अखबार खरीद कर ले जाते थे।
देखते-देखते विश्वसनीयता अमर उजाला का ट्रेड मार्क बन गई। जब तक अमर उजाला में खबर नहीं छपती, तब तक वह पुष्ट नहीं मानी जाती थी। पाठक सरकारी आदेशों से ज्यादा अमर उजाला में छपी खबर पर भरोसा करने लगे। उस दौर में अखबार मेरठ से छपकर आते थे। तब टूटी-फूटी सड़कों से अखबार को देहरादून आते-आते दोपहर हो जाती थी। अखबार के प्रति इस प्रेम और समर्पण की भावनाओं को समझते हुए अमर उजाला प्रबंधन ने तय किया कि अमर उजाला को देहरादून से ही प्रकाशित किया जाए ।
24 फरवरी 1997 की एक गुनगुनी सुबह पटेल नगर स्थित एक दफ्तर में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यज्ञ-पूजन के साथ अमर उजाला देहरादून संस्करण की शुरूआत हुई। यह सेटेलाइट की अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित देश के किसी भी समाचार-पत्र का पहला संस्करण था। अमर उजाला समूह के निदेशक मंडल ने संकल्प लिया कि इस देवभूमि के लोगों की इच्छाओं और सपनों की गूंज इस अखबार में हमेशा-हमेशा सुनाई देती रहेगी। व्यावसायिक हितों से ऊपर उठकर अमर उजाला इस भूमि की जनता की आवाज बनेगा। कोई पच्चीस साल पहले लिए इस संकल्प पर अमर उजाला हमेशा कायम रहा।
जनता की पीड़ा शासन प्रशासन तक पहुंचाना, जुल्म और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करना और रचनात्मकता व प्रगतिशीलता को प्रोत्साहित करना अमर उजाला का मूल मंत्र बन गया। ये सफर आज तक जारी है और अनवरत जारी रहेगा। नए डिजिटल समय में भी अमर उजाला में छपे हुए शब्दों को पढ़े बगैर उत्तराखंड की सुबह नहीं शुरू होती। आपके प्यार और सम्मान ने बीते पच्चीस सालों से अमर उजाला को नंबर वन के पायदान पर बिठाए रखा है। स्नेह और विश्वास के इस अटूट रिश्ते को बनाए रखने के लिए अमर उजाला उत्तराखंड के पाठकों का अभिनन्दन करता है।
ऐसे रहा हमदर्द और हमराही
खबर सिर्फ सूचनाओं का प्रसारण नहीं है। वह एक विचार है जो जंगल में आग की तरह फैलकर दिलो दिमाग पर छा जाता है। इसी फलसफे को केन्द्र बिन्दु बनाकर अमर उजाला ने घोर निराशा और विपत्ति के समय भी मानवीय गरिमा और संवेदना की कीमत पर कोई समझौता नहीं किया। उत्तराखंड की धरती के साथ अमर उजाला का हमदर्द, हमराही या हमसफर का रिश्ता रहा। खबरों के जरिए वह न केवल आम जनता की अभिव्यक्ति की आवाज बना बल्कि हर दुख हर आपदा में वह अपने प्रदेशवासियों के साथ खड़ा दिखा।
केदारनाथ त्रासदी
जून 2013 में आई केदारनाथ आपदा में अमर उजाला ने एक ओर जहां मजबूत स्तंभ के तौर पर जनता के दुख-दर्द, परेशानियों, सरकारी सुस्ती को सामने लाने का काम किया तो दूसरी ओर दुख का साथी भी बना। अमर उजाला फाउंडेशन ने केदारनाथ त्रासदी के पीड़ितों के लिए प्री फेब्रिकेटेड मकान बनवाए। आपदा राहत शिविर आयोजित किए। लोगों ने राहत रिलीफ फंड में पैसा जमा कराया। उधर, प्रदेशवासियों की परेशानियों को दूर कराने के लिए अखबार के माध्यम से सिस्टम की आंखें खोलने का काम किया। आपदा राहत कार्यों में लापरवाही पर भी लगातार अमर उजाला ने सिस्टम को आईना दिखाया।
बांदल घाटी आपदा
केदारनाथ की तरह ही देहरादून की बांदल घाटी में आई आपदा में अमर उजाला पीड़ितों के कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हुआ। बांदलघाटी के आठ गांवों को फिर से खड़ा होने को मजबूत सहारा मिला। अमर उजाला फाउंडेशन ने ग्रामीणों की जिंदगी में रंग भरने की कोशिश की। स्टील के पुल, आवास, खेती-किसानी की ट्रेनिंग, युवाओं को रोजगार और बच्चों को शिक्षा से तरक्की का खाका खींचा गया। आज इन गांवों की अलग पहचान है। अमर उजाला ने न केवल लोगों की आजीविका में सुधार के प्रयास किए बल्कि महिलाओं के समूह बनाकर उन्हें स्वरोजगार के प्रति प्रेरित किया।
नारी निकेतन प्रकरण
नारी निकेतन की दुष्कर्म और गर्भपात पीड़ित मूक बधिर, निजी बोर्डिंग स्कूल की दीवारों के भीतर दुष्कर्म के बाद गर्भपात की शिकार बच्ची या हर साल पढ़कर आगे बढ़ने का सपना देखने वाले छात्रवृत्ति से वंचित गरीब होनहार। अमर उजाला सभी मजलूमों की मजबूत आवाज बनकर खड़ा रहा। नारी निकेतन और बोर्डिंग स्कूल में दुष्कर्म के मामले में अमर उजाला ने गहराई से पड़ताल कर सिस्टम को झकझोर दिया। दुष्कर्मी सलाखों के पीछे गए। छात्रवृत्ति के घोटालेबाजों को भी अमर उजाला ने अपनी पड़ताल से सलाखों के पीछे पहुंचवाया। तमाम ऐसे मौके आए जब अमर उजाला ने अपने पत्रकारीय सिद्धांतों के तहत किसी भी दबाव में आए बिना मजलूमों की आवाज उठाई।
बेपर्दा किए घोटालेबाज
समाज और सिस्टम के लिए नासूर बने घोटालेबाजों को बेपर्दा करने में अमर उजाला ने अहम भूमिका निभाई। निजी स्कूलों और कॉलेजों में फर्जी छात्रों को दिखाकर हुआ छात्रवृत्ति घोटाला, शिक्षक भर्ती फर्जीवाडा, नारी निकेतन प्रकरण, एनएच-74 घोटाला, भाजपा में मी टू, शराब घोटाला, सिडकुल घोटाला, दवाई खरीद घोटाला समेत कई अन्य खुलासे किए। इन खुलासों गहरी नींद में सोए सिस्टम को न सिर्फ जगाने काम किया बल्कि उसे व्यवस्था सुधार लाने के लिए भी मजबूर कर दिया। अमर उजाला में खबरें प्रकाशित होने के बाद सरकार को कई मामलों में जांच शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा। कई घोटालेबाज सलाखों के पीछ भेजे गए।