वायु प्रदूषण लोगों की सेहत बिगाड़ने के साथ ही पर्यावरण पर भी भारी पड़ रहा है। एक अध्ययन के मुताबिक वायु प्रदूषण से वर्षा की मात्रा कम हो रही है और बारिश के दिन भी घटने लगे हैं। वातावरण में मौजूद ऐरोसॉल धरती का तापमान बढ़ाने के साथ ही बादलों के बनने की प्रक्रिया और प्रकृति को प्रभावित कर रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन पर इटली के अंतरराष्ट्रीय सैद्धांतिक भौतिक शोध संस्थान (आईसीटीपी) में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर आलोक सागर गौतम ने शोध किया है। उन्होंने अध्ययन में पाया कि जब वातावरण में ऐरोसॉल की परत मोटी थी, उस दौरान बारिश न के बराबर हुई लेकिन जब ऐरोसॉल कम था, तब बारिश सामान्य हुई।
आईसीटीपी में श्रीनगर और चौरास क्षेत्र में मानसून के महीने (जून से सितंबर 2016) में हुई बारिश के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। 28 जुलाई को श्रीनगर में सर्वाधिक 600 एमएम बारिश दर्ज हुई थी। चार महीने के दौरान 36 दिन ही बारिश हुई, जो कभी ज्यादा और कभी कम थी। रेन गेज से प्राप्त आंकड़ों को दो भागों में बांटा गया। जिन दिनों अच्छी बारिश हुई, उसे सक्रिय स्पेल कहा गया। जब बारिश कम हुई उसको निष्क्रिय स्पेल कहा गया।
डॉ. गौतम ने बताया कि उपग्रह से प्राप्त चित्रों के आधार पर ऐरोसॉल ऑप्टिकल थिकनेस (धूल के कणों की प्रकाशीय मोटाई) का अध्ययन किया गया। अध्ययन में पाया गया कि सक्रिय स्पेल में ऐरोसॉल की मोटाई कम थी, जबकि निष्क्रिय स्पेल में ऐरोसॉल की मोटाई ज्यादा थी। ऐरोसॉल की परत मोटी होने से बादलों के गुणधर्म, आकार, दबाव, वर्षा पथ और प्रकृति प्रभावित हुई। इन सभी कारकों की वजह से बड़ी बूंदें नहीं बनी और बरसात कम हुई।
बारिश न होने से बढ़ जाती है एरोसॉल की मोटाई
डॉ. गौतम ने बताया कि ऐरोसॉल की परत मोटी होने से धरती का तापमान बढ़ेगा। जंगलों की आग और वाहनों से निकलने वाले धुएं से ऐरोसॉल की मोटाई बढ़ती है। इससे गर्मी बढ़ती है और जून माह की बारिश प्रभावित होती है। सक्रिय स्पैल में बारिश होने पर ऐरोसॉल की मोटाई कम हो जाती है और बारिश होती रहती है, लेकिन लगातार 4-5 दिन तक बारिश नहीं होने से एरोसोल की मोटाई बढ़ जाती है। इसका असर बादल बनने की प्रक्रिया पर पड़ता है और बारिश की मात्रा कम हो जाती है।
क्या है एयरोसोल
ऐरोसॉल एक कोलाइड है, यानी हवा का ऐसा मिश्रण, जिसमें ठोस अथवा द्रव के सूक्ष्म कण एक समान रूप से बिखरे होते हैं। कार्बन और धूल के कणों से मिश्रित धुएं के अलावा कोहरा, स्मॉग एयरोसोल के उदाहरण हैं। जब बारिश होती है तब ऐरोसॉल में मौजूद कण पानी की बूंदों के साथ मिलकर जमीन पर आ जाते हैं। इससे ऐरोसॉल की मोटाई कम हो जाती है।