उन्नीस बरस पहले मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर उत्तराखंडियों की अस्मिता पर जो चोट लगी थीं, उसके जख्म आज तक हरे हैं।
जान और आबरू की कीमत पर जिन लोगों ने उत्तराखंड लिया, पिछले तेरह सालों में आई गई सरकारें ना उनके चिन्हीकरण काम भी पूरा नहीं कर सकी और ना ही मुद्दों को बहुत संवेदनशीलता से देखा।
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वजूद बचाने की जद्दोजहद
अलग राज्य का सपना पूरा करने के लिए लहू बहाने वाले लोग आज भी वजूद बचाने की जद्दोजहद से गुजर रहे है। इन्हें खुद को आंदोलनकारी साबित करने के लिए सरकार से मिलने वाले एक प्रमाण पत्र का इंतजार है।
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एक और दो अक्टूबर की मध्य रात्रि में मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर हुए गोली कांड के जिम्मेदार अफसरों ने मौज से नौकरी काटी। सभी दलों के दुलारे रहे इन अफसरों की शान के आगे उत्तराखंड की सरकारें भी नतमस्तक दिखी।
मेरठ रेंज के तत्कालीन डीआईजी बुआ सिंह तो यूपी के डीजीपी पद से रिटायर हुए। मुजफ्फनगर के डीएम रहे अनंत कुमार सिंह तो राजग की सरकार में एक केंद्रीय मंत्री के निजी सचिव भी रहे। एसएसपी आरपी सिंह का भी कुछ नहीं बिगड़ा।
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सरकारों ने नहीं किया अमल
हर बार यह वायदा किया गया कि राज्य आंदोलन से जुड़े मुकदमो में सरकार तीसरा पक्ष बनकर पैरवी करेगी, लेकिन सरकारों ने खुद दी गई जुबान पर भी अमल नहीं किया। राज्य का हक लेने के बाद भी लोग भटकते रहे और सत्तानसीनों पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
हालात तो तब ज्यादा हास्यास्पद हुए जब कांग्रेस की पिछली सरकार में रामपुर तिराहा कांड के दोषी अफसरों को उच्च न्यायालय नैनीताल ने बरी कर दिया। आंदोलनकारी रविंद्र जुगरान व अन्य ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की तब मामला पलटा।
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भले ही भाजपा उत्तराखंड के गठन का श्रेय लेती हो लेकिन खलनायक बने इस अफसरों को बचाने के पीछे भी कुछ भाजपा नेता ही रहे। ऐसा नहीं है कि सरकार ने केवल राज्य आंदोलनकारियों के मुकदमो की पैरोकारी में ही लापरवाही की।
कानूनविदों की फौज नहीं बचा सकी फैसला
पिछले दिनों सरकार ने आंदोलनकारियों या उनके वारिशों को सरकारी नौकरियों में दस प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देने का फैसला किया। लेकिन कानूनविदों की फौज उच्च न्यायालय में इस फैसले को नहीं बचा सकी।
तेरह साल बीत गए लेकिन प्रदेश में आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण नहीं हो सका। आंदोलनकारी सम्मान परिषद के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र जुगरान ने कहा कि आंदोलनकारियों को अलग राज्य का हक तो मिला, इसके बाद कुछ नहीं मिला।