प्रकृति ने अपनी महान संरचना मे अनेक ऐसे अद्भुत जीवों को पैदा किया है, जो निरंतर प्राकृतिक संपदा व जीवन की रक्षा करने व उसको कायम रखने के लिये कार्यरत रहते हैं। इस कड़ी मे जल के तल मे पाये जाने वाले विभिन्न प्रजाति के सीप हैं जो सारा जीवन चुपचाप पानी के प्रदूषण को समाप्त करने के लिये सतत क्रिया करते रहते हैं। एक सीपों की कालोनी ३० से 100 मिलियन गैलन पानी को प्रतिदिन प्रदूषण मुक्त कर देती है। जानिए और खास बातें...
जल जब धरती पर उत्पन्न हुआ, तभी जीव जन्तुओं का वनस्पतियों का सृजन हुआ। जल व जल के स्रोत अगर अस्वस्थ हो जाये तो धरती का सम्पूर्ण जीवन चक्र बाधित हो जायेगा। आज जहां एक तरफ वातावरण के हित को दरकिनार करके विकास के नाम पर प्रकृति को असीम क्षति पहुंच रही है। वहीं दूसरी तरफ उपयोगितावाद ने प्रकृति सहायक जीवों व कारकों के ज्ञान को लाभहीन व अरुचिकर ऋेणी में लाकर खड़ा कर दिया है।
अगर हम धरती को आने वाली पीढी के लिये जीवित रखना चाहते हैं तो हमे दोहन व शोषण मे फर्क करना सीखना होगा। प्रकृति से हम जितना प्राप्त करें कम से कम उसी अनुपात मे लौटाने का गुण हमे सीखना चाहिये। इसके लिये जल जीव सीप उत्कृष्ठ उदाहरण है।
जब कोई उसके शरीर में प्रवेश करता है तो उसे मोती बना देता है सीप
डा अजय कुमार सोनकर
सीप पानी से एक वक्त के भोजन के बदले ढेर सारे पानी को छान कर शुद्ध कर देता है। जब कोई वाह्यकण उसके शरीर मे प्रवेश करके उसको पीड़ा देता है तो सीप उस वाह्यकण को मोती जैसे रत्न मे बदल देता है।
सीपों मे मोती पैदा करने की उत्कृष्ठ तकनीक का अविष्कार करके विश्वभर मे तहलका करने वाले वैज्ञानिक डा० अजय कुमार सोनकर ने बताया कि वर्षों पहले जब उन्होने मीठे पानी में अपना शोधकार्य आरम्भ किया तब मोती पैदा करके धन अर्जित करना ही उनका मकसद था। किन्तु शोध प्रक्रिया ने उन्हें सीपों के महान जीवन का ज्ञान कराया।
जिसके बाद डा० सोनकर का फोकस मोती उत्पादन से हटकर मोती उत्पादन की प्रक्रिया मे होने वाली सीपों की मौतों के तरफ हो गया। एक सघन वैज्ञानिक शोध के बाद सोनकर को सीप को बिना मारे मोती के उत्पादन की तकनीक प्राप्त हुई। जिसने उन्हें विश्व भर मे प्रसिद्ध कर दिया। उन्होंने दुनिया के कई देशों मे मोती बनाने मे सीपों के मौतों पर काबू करने का ज्ञान साझा किया।
चीनी सीपों की देखभाल सिर्फ उनमें मोती बनने तक करते हैं
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अभी हाल मे ही चीन के एक मोती उत्पादन के उपक्रम में दौरे के दौरान डा. अजय कुमार सोनकर ने देखा कि चीनी सीपों की देखभाल व उन्हे मरने से बचाने का प्रयास सिर्फ सीपों मे मोती बनने तक ही करते हैं। मोती बन जाने के बाद लाखों की संख्या में सीपों को पानी से बाहर निकाल के जमीन मे बिखेर देते हैं तथा कतार में बैठे लोग सीपों को मारकर उनका शरीर शेल से अलग कर देते हैं और शरीर को मशीन में डाल कर शरीर से मोती को अलग कर इकट्ठा कर लेते हैं।
इस प्रकार चीन मे मोती उत्पादन का खर्च दूसरों के मुकाबले बहुत कम आता है क्योंकि अगर सीपों के शरीर से मोती शल्य क्रिया के द्वारा निकाला जाय और उसके बाद सीप को गहन उपचार के द्वारा स्वस्थ कराया जाय तो सीप जीवित रहता है, किन्तु इस प्रक्रिया में उत्पादन खर्च बढ़ जाता है। इसलिये चीनी करोड़ों सीपों को मार डालते हैं।
डा० सोनकर ने बताया कि यदि दुनिया से सीप खत्म हो जायें, तो जल की गहराइयों से जीवन भी समाप्त हो जायेगा। फिर कुछ नही बचेगा।