हिमालय में लगभग 90 फीसदी ग्लेशियर (हिमनद) पिघल रहे हैं। इनकी पिघलने की रफ्तार अलग-अलग हैं। ग्लेशियरों से सीधा खतरा तो नहीं है, लेकिन हिमनद ताल (ग्लेशियर फीड लेक) से खतरा जरुर है। इन झीलों, बर्फबारी, बर्फ और हिमनदों के पिघलने का अध्ययन जरुरी है। पड़ोसी देश नेपाल में तीन बड़े ग्लेशियरों पर अध्ययन चल रहा है। भारत में भी इसके वृहद अध्ययन की जरुरत है।
यह कहना है कि काठमांडू विवि नेपाल में पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर रिजान भक्त कायस्था का। कायस्था इन दिनों गढ़वाल विवि श्रीनगर में हिमनद, हिमनद ताल और जलवायु परिवर्तन विषय पर आयोजित कार्यशाला में शिरकत कर हैं।
अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा कि अधिकांश ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं। जलवायु परिवर्तन और मानवीय कारणों से ग्लेशियर प्रभावित हो रहे हैं। ग्लेशियर पिघलेंगे तो पहले बाढ़ आने का खतरा होगा और जब पूरा पिघल जाएंगे तो सूखे का खतरा हो जाएगा।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में अंधाधुंध हवाई उड़ानें बड़ा खतरा
हेलिकॉप्टर
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यात्राकाल में हेलीकाप्टरों की अंधाधुंध उड़ानें उच्च हिमालयी क्षेत्र के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं। वैज्ञानिक शोध में यह साफ हो चुका है कि केदारनाथ की हवाई सेवाओं से यहां पाए जाने वाले दुर्लभ जीव जंतुओं के व्यवहार में परिवर्तन आया है। इनकी प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ा है। हेलीकाप्टर की उड़ान की ऊंचाई निर्धारित नहीं होने से केदारघाटी के गांवों में पालतू पशुओं के आचरण पर भी प्रभाव देखा गया है।
केदारनाथ यात्रा में वर्ष 2015 में जहां 10 हेली कंपनियों ने अपनी सेवा दी थी। तब शुरूआती तीन माह में करीब छह हजार चक्कर हेलीकाप्टरों ने लगाए। इस वर्ष 13 कंपनियों के हेलीकाप्टर 9 मई से जुलाई पहले सप्ताह तक 10 हजार चक्कर लग चुके थे। यह अंधाधुंध उड़ानें खतरनाक साबित हो सकती है।
वर्ष 2012 में जीबी पंत पर्यावरण संस्थान श्रीनगर गढ़वाल के शोध में यह बात सामने आ चुकी है कि केदारनाथ के लिए संचालित की जा रही हवाई सेवाओं से वहां पाए जाने वाले दुर्लभ जीव जंतुओं के व्यवहार में परिवर्तन आया है। इनकी प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ा है। उड़ान के दौरान हेलीकॉप्टर की उड़ान की ऊंचाई निर्धारित नहीं होने से केदारघाटी के गांवों में पालतू पशुओं के आचरण पर भी प्रभाव देखा गया।
यहीं नहीं, हेलीकॉप्टर से उत्सर्जित होने वाली कार्बन डाई आक्साइड गैस से मध्य हिमालय क्षेत्र की वनस्पतियों, बुग्यालों, जड़ी-बूटियों के विकास पर असर पड़ रहा है। हेलीकॉप्टरों की उड़ान से मध्य हिमालय क्षेत्र में जमा बर्फ की सतह भी कमजोर हो रही है। बीते दो वर्षो में यह देखने में आया है कि रामबाड़ा से केदारनाथ तक पैदल मार्ग पर अधिकांश ग्लेशियर मई माह के दूसरे सप्ताह में ही पिघल गए थे।
वर्ष 2012 में किए गए शोध में स्पष्ट था कि हवाई सेवाओं से दुर्लभ जीव जंतुओं के साथ ही पालतू पशुओं के व्यवहार पर असर पड़ा है। इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
- डॉ आरके मैखुरी, वैज्ञानिक प्रभारी जीबी पंत पर्यावरण संस्थान, श्रीनगर गढ़वाल
केदारनाथ और केदारघाटी संवेदनशील क्षेत्र है। हेलीकॉप्टरों की अंधाधुंध उड़ान से सेंचुरी एरिया के वन्य जीव और पक्षियों पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। सरकार को हेलीकॉप्टर के चक्कर निर्धारित रखने के लिए निर्णय लेने होंगे, जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे और यात्रा भी चले।
- पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट
अभी भी नहीं चेते तो न गंगा होगी न रहेगा गोमुख : भारती
हिमालय
पाणी राखो आंदोलन के प्रणेता पर्यावरणविद् सच्चिदानंद भारती का कहना है कि हिमालय के प्रति हिमालयवासियों के साथ ही राज्य और केंद्र सरकार को संवेदनशील होना होगा। ग्लोबल वार्मिंग से हिमालय पर संकट बना हुआ है। समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो न गंगा होगी, न गोमुख रहेगा।
हिमालय को बचाने के लिए सबसे पहले हिमालय के गांवों को बचाना होगा। यह तभी संभव है जब हमारी सरकारें हिमालयवासियों के प्रकृति के साथ जीने के सदियों से चले आ रहे विज्ञान को समझे और उनके अनुरुप नीतियां बनाएं। उनका कहना है कि राज्य बनने के बाद से जिन्होंने राज्य संभाला, उन्होंने हिमालय की ओर पीठ फेर ली। जो लोग हिमालयवासियों को सामान्य सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं करा सके, वे हिमालय के प्रति कितने संवेदनशील होंगे, यह समझना ज्यादा कठिन नहीं है।
भारती ने कहा कि आज इस पर गंभीरता से मंथन करने की जरूरत है कि आखिर हिमालयवासियों का ग्रामीण स्वभाव क्यों बदल रहा है। क्यों लोग नगरों की ओर खिंचते चले जा रहे हैं। आज हिमालय को जीतने के हिसाब से काम हो रहा है। यह सिलसिला नहीं थमा तो पहाड़ की बाकी नदियां भी सूख जाएंगी या फिर बरसाती नदियों में तब्दील हो जाएगी।
कौन हैं सच्चिदानंद भारती
पर्यावरणविद् सच्चिदानंद भारती वर्ष 2015 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। इससे पूर्व मध्यप्रदेश सरकार की ओर से उन्हें 2012 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया। पौड़ी जिले के बीरोंखाल ब्लाक के गाडखर्क उफरैंखाल गांव के मूल निवासी पर्यावरणविद् और सेवानिवृत्त शिक्षक सच्चिदानंद भारती पिछले 35 वर्षों से पर्यावरण और जलसंरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। उनका पाणी राखो आंदोलन विश्व प्रसिद्ध है। कई गावों में जंगल तैयार करने और सूखे स्रोतों को रिचार्ज करने वाले भारती पिछले कोटद्वार के भाबर स्थित घमंडपुर गांव में निवास कर रहे हैं।