मानवाधिकार पहुंचा बच्चों की मौत का मामला
ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में काल के ग्रास बनने वाले नवजातों का मामला मानवाधिकार आयोग पहुंच गया है। शिकायतकर्ता ने आयोग को बताया है कि प्रदेश में तमाम सुविधाओं का दावा किया रहा, फिर भी सड़क पर प्रसव हो रहे हैं। अस्पतालों में इलाज के अभाव में नवजात वहीं दम तोड़ रहे हैं। शिकायतकर्ता ने सभी अस्पतालों में अत्याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराने और मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये मुआवजा दिए जाने की मांग की है।
दूधली निवासी अजय कुमार ने मानवाधिकार आयोग में मांग की कि अस्पतालों में भर्ती मरीजों से फार्म भराकर व्यवस्थाओं को फीडबैक लिया जाए। दून अस्पताल में मरीजों के दबाव को कम करने के लिए अन्य अस्पतालों में निशुल्क एंबुलेंस के माध्यम से शिफ्ट किया जाएगा। इसके अलावा अस्पताल परिसर में मरीजों के अधिकार व डॉक्टरों के कर्तव्यों का बड़ा बोर्ड लगाना चाहिए। प्रदेश के अस्पतालों में डिलीवरी की व्यवस्था, स्टाफ की तैनाती की जाए। साथ ही हर अस्पताल में सीएम हेल्पलाइन या डीजी हेल्थ व उच्च अधिकारियों के स्तर से निगरानी हो, जिससे की असुविधा होने पर मरीज उस नंबर पर शिकायत कर सके।
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कुछ बानगी
पिछले साल छह दिसंबर को घुनी गांव निवासी नंदी देवी (32) को प्रसव पीड़ा के चलते जिला चिकित्सालय गोपेश्वर लाया गया। अल्ट्रासाउंड व अन्य जांच के बाद डॉक्टरों ने उसे देर शाम के समय हायर सेंटर के लिए रेफर किया गया था। जिसके बाद एंबुलेंस न मिलने पर गढ़वाल मंडल ऑपरेटर्स यूनियन की बस में हायर सेंटर श्रीनगर जा रही महिला को सफर के दौरान प्रसव पीड़ा होने लगी, जिससे उसे रास्ते में उतार दिया गया था। उसके पति की कॉल पर आपातकालीन सेवा 108 के पहुंचने से पहले महिला ने सड़क किनारे बच्चे को जन्म दिया। महिला को उपचार के लिए रुद्रप्रयाग जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया है। उपचार न मिलने से उसकी और बच्चे की तबीयत बिगड़ गई। कुछ देर बाद ही नवजात ने दम तोड़ दिया था। इसके अलावा दून महिला अस्पताल में भी कई नवजातों की मौत होने का मामला भी सुर्खियों में रहा था।