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फर्जी साधुओं के चयन की मुहिम बंद

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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने देश भर में फर्जी साधुओं के चयन की मुहिम अब बट्टे खाते डाल दी है। संतों की भीतरी उलझनें कुछ इस कदर रही कि चार वर्षों में भी कोई निर्णय नहीं हो पाया। अब यह मुहिम लगभग बंद कर दी गई है। हरिद्वार में शारदा पीठ के शंकराचार्य बने अच्युतानंद तीर्थ का बहिष्कार अलबत्ता जारी रहेगा।
अखाड़ा परिषद बार-बार यह घोषणा करती आई है कि जिन संतों के कारण संत जगत बदनाम हो रहा है, उन्हें काली सूची में डालकर संत समाज से बाहर निकाला जाएगा। उनमें स्वामी नित्यानंद, राधे मां, आसाराम बापू, रामपाल, ओम बाबा आदि कई संत शामिल हैं। अखाड़ा परिषद का मानना है कि इन संतों के कारण संत जगत को बार- बार बुराइयों का मुंह देखना पड़ता है। इनमें से कोई भी संत अखाड़ों से नाता नहीं रखता। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत नरेंद्र गिरी ने बताया कि जहां तक अच्युतानंद के बहिष्कार का सवाल है, वह जारी रहेगा। उन्हें अगले प्रयाग अर्द्धकुंभ और हरिद्वार कुंभ में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। अखाड़ा परिषद के अखाड़े और संत कई बिंदुओं पर एक निर्णय पर नहीं पहुंच पाए। परिणाम स्वरूप फर्जी संतों के खिलाफ कोई अहम निर्णय नहीं लिया जा सका। अखाड़ा परिषद फर्जी संतों को हटाने के लिए वचनबद्ध है, ताकि भगवा वस्त्रों की लाज बनी रहे। इस काम में अभी देर हो रही है, परंतु एक न एक दिन कोई निर्णय अवश्य ले लिया जाएगा। उधर, भारत साधु समाज, पंचपुरी परिषद एवं षड़दर्शन साधु समाज ने भी इस विषय को त्यागने का फैसला कर लिया है।
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वास्तव में साधु संतों की संस्थाओं के भीतर इतनी लॉबिंग है कि परिषद किसी एक मुकाम पर नहीं पहुंच पाई। प्रयाग, नासिक और उज्जैन के कुंभ मेलों में यह विषय अखाड़ा परिषद के एजेंडे पर लाया गया, परंतु अनिर्णित ही रहा। हाल ही में हरिद्वार में देश भर के संतों का एक सम्मेलन बुलाकर फर्जी संतों के खिलाफ भाषणबाजी तो बहुत की गई, किंतु निर्णय केवल अच्युतानंद तीर्थ के खिलाफ ही लिया जा सका। चूंकि उनके आयोजन में जाने वाले दो संतों ने खेद प्रकाशन कर दिया था, अत: उनका निलंबन रद्द कर दिया गया। खेद न जताने के बावजूद सुमेरु पीठाधीश्वर नरेन्द्रानंद सरस्वती आज भी जगद्गुरु पद पर आसीन हैं और अखाड़ा परिषद उनके विरुद्ध कोई घोषणा नहीं कर पाई है। एक प्रकार से अखाड़ा परिषद में फर्जी संतों के खिलाफ उठाए गए सवालों से अब किनारा ही कर लिया है। निकट भविष्य में ऐसी कोई संभावना नहीं बची है कि संत जगत को बदनाम करने वाले भगवाधारियों के खिलाफ कोई अहम निर्णय अखाड़ा परिषद ले पाए।
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