ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व प्राध्यापिका डॉ.शशि शर्मा ने कहा कि जिंदा रहने के लिए खाना और नींद की तरह साहित्य भी जरूरी है। साहित्य ही परिवार, समाज, देश और पड़ोस को आपस में जोड़ता है। हमें अपने आने वाली पीढ़ी को सामाजिक बनाना है तो किताबों के प्रति उनकी रुचि बढ़ानी होगी। डॉ.शर्मा रविवार को अन्वेषा की ओर से आयोजित मुक्तिबोध की कहानियों एवं कविताओं का पाठ और साहित्य के विविध पक्षों पर आयोजित गोष्ठी में अपने विचार रख रही थीं।
प्रेस क्लब में आयोजित कार्यक्रम में डॉ.शर्मा ने कहा कि वर्तमान में साहित्य की चुनौतियां गंभीर हो गई हैं। साहित्यकारों का बड़ा वर्ग पद, पीठ और पुरस्कारों की होड़ में दरबारी हो गया है। संवेदनशील और जनपक्षधर साहित्यकारों को अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे। साहित्यकारों और संस्कृति कर्मियों का कर्तव्य है कि साहित्य को आम पाठकों तक पहुंचाए। साहित्य की अभिरुचि पैदा करने के लिए रचनात्मक गतिविधियों को समाज में स्थापित करें। वरिष्ठ साहित्यकार त्रेपन सिंह चौहान ने कहा कि मुक्तिबोध की रचनाएं आम जनता के जीवन संघर्ष की हैं। उनका लेखन तत्कालीन समाज के अंतर्विरोधों को समग्रता से समेटता है।
गीता गैरोला ने कहा कि मुक्तिबोध का व्यक्तिगत जीवन में बहुत कठिनाइयों में गुजरा। उन्होंने कोई समझौता किए बगैर लेखन किया। अन्वेषा की संयोजिका कविता कृष्ण पल्लवी ने कहा कि अन्वेषा साहित्यकारों, लेखकों, कलाकारों और मीडियाकर्मियों का एक मंच है। इस दौरान हम्माद फारुखी, डीएन तिवारी, अश्वनी त्यागी, डॉ.विद्या सिंह, राकेश अग्रवाल, वीरेंद्र सिंह नेगी, विजय भट्ट, संजीव घिल्डियाल, बच्चीराम, कल्पना बहुगुणा, मंजू थापा, मोती, रामाधार, सोनिया, कुलदीप सैनी मौजूद थे।