बड़कोट (उत्तरकाशी)। यमुना घाटी के शहीदों के परिवार आज भी सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं, जिससे लोगों में रोष है। लोगों ने शासन-प्रशासन से शहीदों की शहादत को सम्मान देने की मांग की है।
25 मई 2002 को जम्मू कश्मीर के अनंतनाग में हुई आतंकी मुठभेड़ में पोल गांव निवासी आशाराम जगूड़ी शहीद हुए थे। 16 दिसंबर 2012 को हलना गांव निवासी सुभाष चंद्र तथा 23 जून 2013 को बिगराड़ी गांव निवासी राजेश चमियाल भी जम्मू कश्मीर में शहीद हुए थे। इन सभी घटनाओं के बाद सरकार ने शहीदों के सम्मान में सड़क निर्माण आदि कार्य कराने की घोषणा की थी, लेकिन आजतक सड़क नहीं बन पाई है। शहीद आशाराम जगूड़ी के पिता भूरा जगूड़ी ने बताया कि उनके बेटे की शहादत के बाद सरकार ने पेट्रोल पंप देने तथा सड़क व शिक्षण संस्थान का नामकरण करने की घोषणा की थी, लेकिन उनके बेटे की शहादत के करीब 16 साल बाद भी सरकार की कोई घोषणा पूरी नहीं हुई है।
शहीद सुभाष चंद्र के भाई अनिल कुमार ने बताया कि उनके भाई की शहादत पर सरकार ने साढ़े छह किमी लंबी सड़क का निर्माण कर उसका नामकरण करने की घोषणा की थी, जिसका वर्ष 2015 में शिलान्यास भी किया गया। लेकिन अभी तक सड़क का निर्माण शुरू नहीं हो पाया है। शहीद राजेश चमियाल के पिता उपेंद्र चमियाल ने बताया कि उनके बेटे की शहादत पर सरकार ने सड़क व जीजीआईसी गडोली का नामकरण करने की घोषणा की थी, लेकिन दोनों ही घोषणाएं अधूरी पड़ी हैं। विधायक केदार सिंह रावत का कहना है कि शहीदों के सम्मान को बरकरार रखने व उनके परिजनों की मांग को पूरा करने के लिए सरकार हरसंभव प्रयास करेगी।