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नजूल की भूम

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हरिद्वार। नगर निगम की संपत्तियों और उसके प्रबंधन की नजूल भूमि का रिकार्ड तैयार करने के लिए गठित हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण व नगर निगम की संयुक्त टीम ब्रिटिशकालीन तक के रिकार्ड को खंगाल रही है। इससे साफ होगा कि नगर निगम के पास कितनी नजूल भूमि है और वह किस स्थिति में है।
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पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने सरकारी नजूल भूमि का जो प्रबंधन ब्रिटिशकाल से नगर निकायों के पास था उसको छीनकर हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण को देने का निर्णय लिया था। नगर निगम हरिद्वार के प्रबंधन की नजूल भूमि का हस्तांतरण अभी तक हरिद्वार- रुड़की विकास प्राधिकरण को नहीं किया जा सका है। नगर निगम अधिकारियों को अभी तक यही पता नहीं है कि नगर निगम की अपनी भूमि कितनी और कौन सी है। सरकारी नजूल भूमि कितनी और कौन सी है। नगर निगम में संपत्तियों के रिकार्ड की स्थिति बहुत ही खराब है। इसलिए नगर आयुक्त नितिन सिंह भदौरिया ने नगर निगम की संपत्तियों और सरकारी नजूल भूमि के अभिलेखों को खंगालने व उनको दुरुस्त करने के उद्देश्य से संयुक्त टीम का गठन किया है। इस टीम में प्राधिकरण के सचिव बंशीधर तिवारी, तहसीलदार ऋषिपाल चौहान व रिकार्ड कीपर शिवशंकर और नगर निगम से सहायक नगर आयुुक्त पीके बंसल, प्रभारी सहायक अभियंता दिनेश प्रसाद उनियाल, तकनीकी विशेष कार्याधिकारी अब्दुल रऊफ, कर एवं राजस्व अधीक्षक (संपत्ति) रमेश सिंह रावत, जीसी प्रथम रविंद्र राठौर और विविध मांग लिपिक वेदपाल शामिल हैं। नितिन सिंह भदौरिया नगर आयुक्त होने के साथ ही हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष (वीसी) भी हैं। इसलिए यह उम्मीद जताई जा रही है कि अब नगर निगम की संपत्तियों के रिकार्ड का दुरुस्तीकरण हो जाएगा।
नजूल भूमि प्रबंधन छीनने का पहले विरोध किया था
हरिद्वार। कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2015 में जब सरकारी नजूल भूमि का प्रबंधन नगर निगम से छीनकर हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण को देने का आदेश जारी किया था। तब भाजपा के नगर निगम बोर्ड ने इसका कड़ा विरोध किया था। महापौर मनोज गर्ग ने इसके विरोध में जमकर राजनीति भी की थी। उन्होंने अर्द्धकुंभ मेला 2016 में नगर निगम प्रबंधन की नजूल भूमि पर उसकी एनओसी और भूमि के बदले में नगर निगम को कुछ नहीं देने का विरोध करते हुए पर्यटन विभाग द्वारा शुरू कराए गए राज्य अथितिगृह (स्टेट गेस्ट हाउस ) का निर्माण रुकवाया था। इसका नतीजा यह हुआ था कि तत्कालीन शासन ने नगर निगम के कार्यालय भवन निर्माण के लिए 5 करोड़ 60 लाख रुपये देने की स्वीकृति प्रदान की थी। अब जब प्रदेश में सरकार भी उन्हीं की है और शहरी विकास मंत्री भी उनका ही है तब वह नगर निगम को कुछ दिलाने के बजाय छीने जाने की प्रक्रिया पर भी चुप्पी साधे हुए हैं। अपनी सरकार बनने के बाद भी वह तत्कालीन सरकार के समय स्वीकृत कार्यालय भवन निर्माण की स्वीकृत धनराशि को अवमुक्त नहीं करा सके हैं।
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