सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे मतदानकर्मियों के मानदेय संबंधी एक शासनादेश से शहर के कई बीएलओ गुमराह होकर हंगामा करने पहुंच गए। बीएलओ (ज्यादातर महिलाएं) ने कहा कि सबसे ज्यादा उन्होंने काम किया, लेकिन उन्हें ही मानदेय नहीं दिया जा रहा है। काफी देर तक चले इस हंगामे के बाद जब अधिकारियों ने शासनादेश देखा तो इसके फर्जी होने की पुष्टि हुई। इसके बाद बीएलओ शांत हुए।
दरअसल, बीएलओ (बूथ लेवल अफसर) के लिए छह हजार रुपये प्रति वर्ष वेतन निर्धारित है। इसके तहत उनके ऊपर मतदान बूथ स्तर की मतदाता सूची तैयार करने का जिम्मा रहता है। इसी में उन्हें मतदाताओं से संबंधित सभी छोटे बडे़े काम और मतदान दिवस पर तमाम व्यवस्थाएं करनी होती हैं। इस वार्षिक वेतन के अलावा उनके लिए कोई मानदेय नियत नहीं है। इसी मांग को लेकर सोमवार को दर्जनों बीएलओ जिला निर्वाचन कार्यालय के बाहर हंगामा किया। उनके हाथों में एक शासनादेश था, जिसमें बीएलओ के लिए 750 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मानदेय दिया जाना दर्शाया गया था। हंगामा करने वालों में ज्यादातर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता शामिल थीं।
इस पर सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी पीएस रावत ने उनसे बात कर सारी स्थिति साफ की। उन्होंने कहा कि यह शासनादेश फर्जी है। बीएलओ के लिए कोई मानदेय निर्धारित नहीं है। इस पर उन्होंने वायरल हो रहे इस शासनादेश के संबंध में जिलाधिकारी को भी अवगत कराया। जिलाधिकारी ने इस मामले में जांच के निर्देश दिए हैं।
मतदाता पहचानपत्र में कई खांमियां, बीएलओ पर दबाव
बीएलओ ने इस मामले के अलावा मतदाता पहचानपत्र में खामियों का मामला भी उठाया। उन्होंने कहा कि कई बार प्रपत्र भेजने के बाद भी मतदाता पहचानपत्र में भारी त्रुटियां हैं। इस सबको लेकर मतदाता बीएलओ के पास हंगामा कर रहे हैं। बीएलओ ने चेतावनी दी कि वे जल्द ही इस मामले को लेकर भी बात उच्चाधिकारियों तक उठाएंगे। बार कहने के बाद भी मतदाता पहचानपत्र में पिता की जगह पति, श्रीमति की जगह श्री आदि छप गया है। साथ ही जिस व्यक्ति की मृत्यु हो गई उसका मतदाता पहचानपत्र भी उनके घर पर पहुंच गया। जबकि, इस संबंध में कई बार विभाग को सूचित किया जा चुका है।