केदारनाथ।आपदा के बाद यह पहला मौका है, जब केदारनाथ धाम पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को न तो पैदल मार्ग पर ग्लेशियर नजर आए और न धाम में बर्फ के ढेर। यहां की पहाड़ियां चारों तरफ शुष्क बनी हुई है।
बीते वर्ष अक्तूबर के बाद से अप्रैल तक में अभी तक मात्र 150 मिमी बारिश हुई है, जिसका असर मध्य हिमालय क्षेत्र में भी देखने को मिल रहा है। गौरीकुंड-केदारनाथ पैदल मार्ग पर इस वर्ष श्रद्धालुओं को एक भी ग्लेशियर नजर नहीं आया। भीमबली से रुद्रा प्वाइंट के बीच छह ग्लेशियर प्वाइंट में मात्र एक स्थान पर रास्ते से करीब 10 मीटर बर्फ की परत नजर आई। इसके अलावा अन्य ग्लेशियर वाले स्थानों पर सिर्फ पानी बह रहा है। केदारनाथ में भी बर्फ का नामोनिशान नहीं है। यहां मंदिर परिसर से चोराबाड़ी ताल की तलहटी हो या फिर दुग्ध गंगा व भैरवनाथ मंदिर क्षेत्र, पूरा क्षेत्र बर्फविहीन है। केदारनाथ क्षेत्र में सिर्फ मेरू-सुमेरू पर्वत श्रृंखलाओं के ऊपरी व मध्य क्षेत्र में बर्फ जमी है। आपदा के बाद यह पहला मौका है, जब केदारनाथ धाम के कपाट खुलने के मौके पर श्रद्धालुओं को यहां बर्फ के दर्शन नहीं हुए। बता दें कि वर्ष 2015 में यहां भीमबली से केदारनाथ तक जगह-जगह पर 9 से 12 फीट तक बर्फ के ढेर थे। पैदल मार्ग पर सभी ग्लेशियर जोन, बर्फ से लकदक थे, जिन्हें काटकर रास्ता बनाया गया था। यही नहीं, केदारनाथ मंदिर के ठीक सामने करीब 6 फीट ऊंचा बर्फ का टीला था। वर्ष 2016 व 2017 में भी यहां 2 से 5 फीट तक बर्फ मौजूद थी, लेकिन इस बार पूरा क्षेत्र बर्फविहीन है। इस संबंध में पर्यावरणविद् जगत सिंह जंगली का कहना है कि यह स्थिति सिर्फ केदारनाथ ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य हिमालय में बनी हुई है। इसका कारण यहां भारी मशीनों का उपयोग और मानवीय आवाजाही का बढ़ना है।