ब्यूरो/ अमर उजाला, देहरादून
कैबिनेट बैठक में मिली आजादी के आधार पर बढ़ी मेडिकल पीजी सीटों की फीस गत वर्ष दाखिला लेने वाले छात्रों को भी जमा करानी होगी। चूंकि गत वर्ष छात्रों ने शपथ पत्र के आधार पर दाखिले लिए थे। इस शपथ पत्र में साफ किया गया था कि अगर फीस बदली तो बढ़ी हुई फीस जमा करानी होगी। अब छात्रों को चिंता सता रही है कि एक साथ इतनी फीस कहां से देंगे।
सरकार ने हाल ही में कैबिनेट बैठक में निजी मेडिकल कॉलेजों को इस आधार पर फीस तय करने का अधिकार दे दिया, क्योंकि वह यूनिवर्सिटी हैं। इसमें स्वामी राम हिमालयन यूनिवर्सिटी का हिमालयन मेडिकल कॉलेज, एसजीआरआर यूनिवर्सिटी का एसजीआरआर मेडिकल कॉलेज और सुभारती यूनिवर्सिटी का सुभारती मेडिकल कॉलेज शामिल है। इन कॉलेजों ने पीजी की फीस 24 लाख से 30 लाख रुपये तक कर दी है। गत वर्ष जिन छात्रों ने एडमिशन लिया था, उनकी फीस आठ से दस लाख रुपये तो जरूर थी लेकिन साथ में उनसे एक शपथ पत्र भी लिया गया था। शपथ पत्र में साफ किया गया था कि छात्रों को बढ़ी हुई फीस देनी होगी। इस शपथ पत्र के हिसाब से मानें तो बढ़ी हुई फीस गत वर्ष के हिसाब से देनी होगी। ऐसे में छात्रों के ऊपर सीधे लाखों रुपये का बोझ आ गया है। दबी जुबान में छात्र विरोध भी कर रहे हैं। अब फीस से संबंधित कोई भी फैसला इन विश्वविद्यालयों के अधिकार में होगा।
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फीस का अधिकार देना दुर्भाग्यपूर्ण : रविंद्र जुगरान
राज्य के निजी मेडिकल कॉलेजों को शुल्क तय करने का अधिकार देना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। यह कहना है भाजपा नेता एवं पूर्व राज्यमंत्री रविंद्र जुगरान का। उन्होंने कहा कि सरकार के इस फैसले से योग्यता और गरीब परिवारों के मेधावी आगे नहीं बढ़ पाएंगे। उनके लिए डॉक्टर बनना बेहद मुश्किल हो जाएगा। जुगरान ने कहा कि वर्ष 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्य सरकारों को आदेश दिया था कि वह अपने शुल्क निर्धारण के लिए प्रवेश एवं शुल्क निर्धारण समिति का गठन करें। इसी क्रम में उत्तराखंड में भी वर्ष 2006 में इसके लिए कानून बनाया गया था। उन्होंने कहा कि कैबिनेट के इस फैसले से मेडिकल शिक्षा का बाजारीकरण और व्यावसायीकरण होगा, जिससे गुणवत्ता भी प्रभावित होगी।