कई सरकारी दावों के बावजूद अब तक प्रदेश के 20 फीसदी किसान भी फसल बीमा के दायरे में नहीं लाए जा सके हैं। जबकि प्रदेश के मौसम में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव होने के कारणा सीधा असर फसलों पर पड़ता है।
बीमित किसानों में भी अधिकांश ऐसे हैं जो कि क्रेडिट कार्ड धारक हैं। नियमानुसार संबंधित बैंक इनकी फसल का बीमा करने के बाद ही कर्ज देते हैं। इस समय प्रदेश में दो तरह की फसल बीमा योजनाएं चल रही हैं। पहली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, दूसरी मौसम आधारित फसल बीमा योजना।
पहली योजना के तहत धान, गेहूं, मंडुवा की फसलों का बीमा किया जाता है। मसूर की फसल को जोड़े जाने की प्रक्रिया चल रही है। जबकि मौसम आधारित बीमा योजना के तहत सेब, आम, लीची, आलू, टमाटर, अदरक, माल्टा, फ्रेंचबीन, मिर्च का बीमा किया जाता है। इस समय प्रदेश में कुल नौ लाख 12 हजार किसान हैं।
इनमें से बीती खरीफ की फसल तक प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत एक लाख 70 हजार किसान ही बीमित हुए थे। जबकि मौसम आधारित फसल बीमा योजना के तहत 45 हजार किसानों का ही बीमा हुआ है। प्रदेश में करीब 95 फीसदी छोटी जोत वाले किसान हैं, जो कि मौसम के कारण करीब करीब हर फसल में प्रभावित होते हैं।
पूरे प्रदेश में फसल बीमा की जिम्मेदार सरकारी संस्था एग्री इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया के क्षेत्रीय प्रबंधक डॉ. एस प्रसाद का कहना है कि प्रदेश भर में काफी तेजी के साथ फसल बीमा किया जा रहा है। हम बीते सालों की तुलना में अब उल्लेखनीय सफलता हासिल कर रहे हैं।
वित्तीय वर्ष 2015-16 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में खरीफ, रबी दोनों फसलों को मिलाकर एक लाख 49 हजार किसान थे जबकि अब सिर्फ खरीफ में ही एक लाख 70 हजार बीमा धारक किसान हैं। इस वित्तीय वर्ष में हम तीन लाख के ऊपर किसानों को इसमें शामिल कर लेंगे। इसके अलावा बिना किसान क्रेडिट कार्ड वाले किसानों को भी जोड़ने के लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं।
मैदानी जिले हैं आगे
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में पहाड़ी जिलों की तुलना में मैदानी जिले काफी आगे हैं। इसमें ऊधमसिंह नगर में 58 हजार और हरिद्वार में 22 हजार किसान हैं, जबकि चमोली, चंपावत में 1400 किसान ही बीमित हैं। इसी तरह उत्तरकाशी में 1800, रुद्रप्रयाग में 2300, बागेश्वर में 2400, अल्मोड़ा में 4000, देहरादून में 4800, टिहरी में 5200, नैनीताल में 7500, पौड़ी में 6000, पिथौरागढ़ में 8000 किसानों का फसल बीमा किया गया है।