इसी बीच बाजार में भीड़ एकत्र हुई और कुछ नेताओं के उकसावे पर अचानक बेकाबू भीड़ ने सिख परिवार की राशन की दुकान के ताले तोड़े और लूटपाट शुरू कर दी। इसके बाद एक मेडिकल स्टोर और फिर उनकी दुकान को निशाना बनाया गया।
दुकान के भीतर रखा स्कूटर और फ्रिज उठाकर सड़क पर फेंक दिया गया और लाठी-डंडों से उन्हें तोड़ दिया। इसके अलावा दुकान में रखे टीवी और अन्य सामान में तोड़फोड़ कर कुछ सामान भी लूट लिया गया।
उन्होंने बताया कि उनकी आंखों के सामने भीड़ सामान तोड़ती रही। इसके बाद भीड़ नैनीताल रोड पर एक पेट्रोल पंप को जलाने भी पहुंच गई थी लेकिन पंप संचालक के आत्मरक्षा में हवाई फायर करने से नुकसान नहीं हुआ था।
हालांकि प्रशासन ने उल्टा पंप संचालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लाइसेंसी असलहा जमा कर दिया था, लेकिन बाद में वह मुकदमा खारिज हो गया था। वे बताते हैं कि सिखों के साथ छुटपुट मारपीट और पत्थरबाजी की घटनाएं हुई थी।
कई दिनों तक सिख परिवारों में असुरक्षा की भावना रही। गुरप्रीत कहते हैं कि सभी जानते थे कि सिख दंगों के दोषी कौन हैं लेकिन दोषियों को सजा मिलने में इतने साल लग गए। सरकारों की इच्छाशक्ति की कमी के साथ ही सभी पार्टियों का रुख भी बेहद खराब था।
गुरप्रीत बताते हैं कि रुद्रपुर के अलावा हल्द्वानी, नैनीताल और अन्य जगहों पर भी भीड़ ने सिखों की दुकानों में तोड़फोड़ की थी। प्रशासन ने हल्द्वानी में तो मुआवजा बांटा था, लेकिन रुद्रपुर को मुआवजे से महरूम रखा गया। उनकी दुकान में भी उस वक्त ढाई से तीन लाख का नुकसान हुआ था। कई और सिख व्यापारियों को भी नुकसान पहुंचा था लेकिन कई चिट्ठी पत्र भेजने के बावजूद मुआवजा नहीं मिला।