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राज्य के सभी अस्पतालों की जांच के आदेश

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राज्य के सभी अस्पतालों की जांच के आदेश
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ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। उत्तराखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से साल 2016 से पूर्व तमाम बकाया पंजीकरण शुल्क माफ किए जाने व शुल्क की दरें पहले की तुलना में कम किए जाने के बावजूद अस्पताल संचालक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में पंजीकरण नहीं करा रहे हैं। इस नियम के दायरे में सरकारी अस्पताल भी आते हैं लेकिन खास बात ये है कि उनका भी पंजीकरण नहीं कराया जा रहा है।
इसे गंभीरता से लेते हुए बोर्ड के सदस्य सचिव ने नाराजगी जताते हुए सभी मंडलीय अधिकारियों से अपने-अपने क्षेत्रों में अभियान चलाने का आदेश दिया है। अधिकारियों को हिदायत दी गई कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में हर माह 25 अस्पतालों का निरीक्षण कर इसकी रिपोर्ट बोर्ड को सौंपे।
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उल्लेखनीय है कि शासन के निर्देश पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अस्पताल संचालकों से सहमति व प्राधिकार शुल्क के मद में वसूली जाने वाली धनराशि को साल 2001 से लेकर 2016 तक माफ कर दिया था। बोर्ड बैठक में निर्णय लिया गया कि साल 2016 के बाद से ही शुल्क की वसूली की जाए। निर्णय के मुताबिक शुल्क की दरें भी घटा दी थी। 50 बेड से कम संख्या वाले अस्पतालों से 1500 रुपये सहमति शुल्क व 500 रुपये प्राधिकार शुल्क, जबकि 50 से लेकर 200 बेड वाले अस्पताल संचालकोें से 2500 रुपये सहमति शुल्क व 1000 रुपये प्राधिकार शुल्क वसूले जाने का निर्णय लिया गया। इसी प्रकार 200 से लेकर 500 बेड वाले अस्पतालों के संचालकों से 7500 रुपये सहमति शुल्क व 5000 रुपये, वहीं 500 से अधिक बेड वाले अस्पताल संचालकाें को 10000 रुपये सहमति शुल्क व 7000 रुपये प्राधिकार शुल्क वसूले जाने का निर्णय लिया गया था, लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद अस्पताल संचालक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में पंजीकरण नहीं करा रहे हैं। अब इस मामले में बोर्ड के सदस्य सचिव ने सभी मंडलीय अधिकारियों को हिदायत दी है कि वे अपने अपने क्षेत्रों में अभियान चलाकर पंजीकरण कराना सुनिश्चित करें।
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