धारणा है कि इन मंत्रों का जाप यजमानों को स्वयं करना होता था और ये न सिर्फ उन्हें शत्रुओं की साजिशों और दुर्भावनाओं का शिकार होने से बचाते थे, बल्कि उन्हें परिवार के किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा की नकारात्मक ऊर्जा से भी रक्षा करते थे।
रुद्रप्रयाग बाजार से करीब 10 किमी फासले पर स्थित सतेराखाल 18वीं सदी के उत्तर्राद्ध में सतेरा गढी थी। स्वर्गीय धनसिंह बर्त्वाल इस गढी के मालगुजार थे।
उनके पड़पौते महेंद्र सिंह बर्त्वाल कहते हैं कि उनके पुराने घर में मृग की खाल मे लिपटी रिंगाल की एक कंडी में बहुत से पुराने दस्तावेज रखे थे। यह कंडी सदियों पुरानी है। बचपन से ही वे दस्तावेज उन्हें आकर्षित करते थे। उनके मन में सदैव यह जिज्ञासा रही कि आखिर उसमें क्या है? जब वह ग्रेजुएट हो गए तो उन्होंने इन दस्तावेजों को खंगालना शुरू किया। उनसे मालूम हुआ कि उनकी रचना 18वीं सदी में हुई है। इनमें शत्रु हंता लहरी भी मिली।
इस तरह का मंत्र जाप शायद ही किसी ने अभी तक रचा हो
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उन्होंने बताया कि इसे हमारे राजगुरू मयकोटि गांव के पंडित बैजराम वशिष्ठ ने संवत 1942 श्रावण चार गते यानी 1885 में रचा था। विरजोणा थाती सतेरा गांव का उस काल में एक केंद्रीय स्थान था, जहां तत्कालीन मुखिया रहते थे।
पिछले दिनों यूसेक के निदेशक जब उनके यहां आए तो उन्होंने इन दस्तावेजों का अवलोकन किया। जिसे देखकर उन्होंने इन्हें बेहद दुर्लभ बताया। अब वह इनके संरक्षण के लिए प्रयास कर रहे हैं और ऐसे ही मिलते-जुलते दस्तावेजों के संग्रह पर जोर दे रहे हैं।
यूसेक के निदेशक डॉ. एमपीएस बिष्ट के मुताबिक, पहाड़ के वर्तमान जानकार पंडितों का मानना है कि इस तरह का मंत्र जाप शायद ही किसी ने अभी तक रचा हो। इसलिये भी यह दस्तावेज अद्वितीय है और हमारे पहाड़ की एक महत्वपूर्ण धरोहर है, जिसे आज संरक्षित करने की अति आवश्यकता है। इस संबंध में उन्होंने रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी से बात की है। उनके सहयोग और धर्मस्व विभाग के माध्यम से पांडुलिपि के संरक्षण के प्रयास किए जाएंगे।
माना जाता है कि शत्रुओं का नाश करने वाला मंत्र रचियता द्वारा नहीं पढ़ा जाता था। इसीलिए इस पांडुलिपि के अंत में पाठस्थि धन सिंह बर्त्वाल लिखा है।
कुछ और नायाब वस्तुएं भी मिली
मालगुजार के कोठे से 18वीं सदी की दो नायाब वस्तुएं भी मिली हैं। इनमें एक पिठाला है। हिरन की खाल से जड़ित ढ़क्कन युक्त रिंगाल की यह कंडी तांबे के तार से बनें कंगनों से बंधित है।
उस कालखंड में आवश्यक दस्तावेज ऐसी ही कंडी में रखे जाते थे। दूसरी नायाब वस्तु एक कहार है जो टिहरी राज परिवार के परमार वंश से जुड़ी है।