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...तो अब रुकेगी निजी अस्पतालों की मनमानी

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...तो अब रुकेगी निजी अस्पतालों की मनमानी
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ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। विधानसभा से क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट (रजिस्ट्रीकरण एवं विनियमन) एक्ट पारित होने के पांच वर्ष बाद भी सरकार इसे अभी राज्य में लागू नहीं करवा पाई है। इसके चलते निजी अस्पतालों के संचालक इलाज के एवज में मरीजों से मनमानी राशि वसूल रहे हैं, जबकि इस एक्ट के तहत इलाज की दरें तय करने का प्रावधान है। अब हाईकोर्ट ने सरकार को बगैर लाइसेंस के संचालित अस्पतालों और क्लीनिकों को तत्काल प्रभाव से बंद करने का आदेश जारी किया है। ऐसे में उम्मीद जगी है कि अब गैरकानूनी तरीके संचालित निजी अस्पतालों और क्लीनिकों पर शिकंजा कसा जा सकेगा।

विधानसभा में पारित, पर नहीं लागू हो पाया एक्ट
वैसे तो क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट को केंद्र सरकार ने 2010 में पारित कर दिया था। साथ ही सभी राज्यों को इसे कड़ाई से लागू कराने की बात कही थी। उत्तराखंड में यह एक्ट साल 2013 में विधानसभा में पारित किया गया, लेकिन इसे अभी लागू नहीं किया जा सका है। यह एक्ट लागू कराना सरकार व स्वास्थ्य अधिकारियों के सामने बड़ी चुनौती है।
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राज्य में 158 सरकारी, 752 निजी अस्पतालों का ही अस्थायी पंजीकरण
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य में 158 सरकारी व 752 निजी अस्पतालों और क्लीनिकों का ही पंजीकरण कराया गया है। यह भी अस्थायी है। क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट लागू नहीं होने की वजह से स्थायी पंजीकरण नहीं कराया जा सका है। सबसे अधिक 213 निजी अस्पताल ऊधमसिंह नगर में पंजीकृत हैं। देहरादून में 174, टिहरी गढ़वाल में 104, अल्मोड़ा में 57, चमोली में 18, चंपावत में 31, हरिद्वार में 69, नैनीताल में 81, उत्तरकाशी में 17 और रुद्रप्रयाग में मात्र नौ अस्पताल पंजीकृत हैं। जबकि हकीकत यह है कि इन आंकड़ों से इतर निजी अस्पतालों और क्लीनिकों की संख्या कहीं अधिक है।
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किसी भी अस्पताल में नहीं है इलाज की दरों की सूची
क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत सरकारी व निजी अस्पतालों में इलाज की दरों के साथ ही पैथोलॉजी जांच समेत तमाम परीक्षणों के दरों की सूची लगाने का प्रावधान है। लेकिन एकाध अस्पताल को छोड़कर किसी भी अस्पताल में यह सूची नहीं लगी है। ऐसे में मरीजों व तीमारदारों को इस बात की जानकारी ही नहीं हो पाती है कि किस बीमारी व जांच के लिए कितना भुगतान करना होगा।
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सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर भी लिख रहे ब्रांडेड दवाइयां
केंद्र के साथ राज्य सरकार व स्वास्थ्य विभाग का इस बात पर जोर है कि मरीजों का इलाज सस्ते में किया जा सके। इसके लिए मरीजों को जेनेरिक दवाइयां लिखी जाएं। जबकि हकीकत यह है कि निजी अस्पतालों के साथ ही सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर भी मरीजाें को बाहर की ब्रांडेड दवाइयां लिख रहे हैं। जिसकी बानगी दून, कोरोनेशन जैसे सरकारी अस्पतालों के बाहर संचालित निजी मेडिकल स्टोरों पर मरीजों की भारी भीड़ के रूप में देखी जा सकती है।
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इलाज की दरें तय करने को जल्द गठित हो सकती है समिति
सरकारी व निजी अस्पतालों में मरीजों के इलाज, ऑपरेशन व पैथोलॉजी जांच की दरें तय करने को लेकर जल्द ही समिति का गठन किया जा सकता है। स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. टीसी पंत का कहना है कि इस संबंध में शासन के निर्देशानुसार जल्द ही कार्रवाई की जाएगी।
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कोट ...
हाईकोर्ट के फैसले की जानकारी है। कोर्ट के आदेश का पालन कराया जाएगा। इस संबंध में जल्द ही आला अफसरों के साथ बैठक कर तमाम पहलुओं पर चर्चा की जाएगी। क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट को लागू कराने का प्रयास होगा। इस संबंध में आईएमए के पदाधिकारियों और डॉक्टरों का भी सहयोग लिया जाएगा।
- डॉ. टीसी पंत, स्वास्थ्य महानिदेशक
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